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खेती की जमीन पर अब फसल भी, बिजली भी! सरकार के एग्रीवोल्टाइक प्लान से किसानों को नई उम्मीद

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खेती की लागत बढ़ने और आमदनी को लेकर बनी चिंता के बीच किसानों के लिए एक नई तकनीक उम्मीद बन सकती है। सोचिए, अगर आपके खेत में गेहूं, सब्जियां या दूसरी फसलें भी उगें और उसी जमीन से सौर बिजली भी बने, तो कैसा रहेगा? केंद्र सरकार इसी संभावनाओं वाले मॉडल को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। Agrivoltaics Technology के जरिए खेती और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़ने की योजना पर जोर दिया जा रहा है।

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21 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित सातवें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इस तकनीक को बढ़ावा देने की बात कही। सरकार की योजना है कि खेती की जमीन का इस्तेमाल केवल एक उद्देश्य के लिए न हो, बल्कि किसान फसल उत्पादन जारी रखते हुए बिजली से जुड़ी अतिरिक्त आय के अवसर भी तलाश सकें।

क्या है Agrivoltaics Technology, जो खेत और बिजली दोनों का रास्ता खोल सकती है?

आसान भाषा में समझें तो Agrivoltaics Technology ऐसी व्यवस्था है, जिसमें खेत के ऊपर निर्धारित ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उनके नीचे फसलों की खेती जारी रहती है। सामान्य सोलर पार्क में जमीन का मुख्य उपयोग बिजली बनाने के लिए होता है, जबकि एग्रीवोल्टाइक मॉडल में कृषि उत्पादन को भी प्राथमिकता दी जाती है।

इसमें पैनलों की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी और सूर्य की रोशनी की उपलब्धता के हिसाब से खेत का डिजाइन तैयार किया जाता है। सही योजना होने पर ट्रैक्टर, जुताई के उपकरण और सिंचाई व्यवस्था के लिए जगह बचाई जा सकती है।

Agrivoltaics Technology का असली फायदा तभी मिलेगा, जब किसान की खेती प्रभावित हुए बिना बिजली उत्पादन हो। इसलिए केवल खेत में सोलर पैनल खड़े कर देना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि कौन-सी फसल छाया में बेहतर बढ़ सकती है और स्थानीय मौसम में कौन-सा डिजाइन कारगर होगा।

छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर बनेगा नया मॉडल

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जोर दिया कि देश के छोटे और सीमांत किसानों के हित इस तकनीक की नीति के केंद्र में होने चाहिए। भारत में 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं। इनके लिए अपनी जमीन का बड़ा हिस्सा खेती से हटाकर केवल सौर बिजली उत्पादन में लगाना व्यावहारिक नहीं है।

ऐसे में Agrivoltaics Technology को इस तरह विकसित करना होगा कि किसान अपनी जरूरत के अनुसार फसल चुन सकें, फसल चक्र बदल सकें और खेत में कृषि मशीनों का इस्तेमाल कर सकें।

मान लीजिए किसी किसान को हर साल गेहूं के बाद मूंग या सब्जियों की खेती करनी है। पैनल और खंभों की बनावट ऐसी होनी चाहिए कि उसकी खेती की योजना बाधित न हो। यदि हर बार ट्रैक्टर ले जाने, निराई-गुड़ाई या कटाई में परेशानी आएगी, तो किसान के लिए यह मॉडल नुकसानदेह भी बन सकता है।

इसी वजह से सरकार और कृषि अनुसंधान संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा व्यावहारिक मॉडल तैयार करना है, जो बड़े सोलर प्रोजेक्ट के साथ छोटे खेतों में भी उपयोगी साबित हो।

PM-KUSUM के अगले चरण से Agrivoltaics Technology को मिलेगी रफ्तार

इस योजना को लेकर सबसे अहम संकेत पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण से जुड़ा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार, सरकार इस चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है। यह अभी घोषित दिशा और तैयारी है; किसानों को आवेदन की तारीख, पात्रता और सहायता की वास्तविक शर्तें आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी होने पर ही पता चलेंगी।

सरकार के मुताबिक, पीएम-कुसुम के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। इस अनुभव के आधार पर Agrivoltaics Technology को खेती और बिजली उत्पादन के संयुक्त मॉडल के रूप में आगे बढ़ाने की संभावना देखी जा रही है।

किसानों को फिलहाल किसी एजेंट के दावे पर भरोसा करके निवेश नहीं करना चाहिए। योजना के अगले चरण में सब्सिडी, परियोजना का खर्च, बिजली खरीदने की व्यवस्था और आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी, इसकी पुष्टि सरकारी पोर्टल या संबंधित राज्य एजेंसी से करनी होगी।

4.75 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में दिख रही है संभावनाएं

एग्रीवोल्टाइक तकनीक की संभावनाओं को समझने के लिए जमीन और बिजली की जरूरत, दोनों को साथ देखना होगा। ऊर्जा मंत्री ने TERI के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि भारत की लगभग 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से करीब 4.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन तकनीकी रूप से इस मॉडल के लिए उपयुक्त हो सकती है। यानी यह अनुमानित रूप से लगभग 30 प्रतिशत कृषि भूमि के बराबर है।

अध्ययन में 1.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर एग्रीवोल्टाइक व्यवस्था के एक संभावित परिदृश्य से सालाना 12,775 टेरावाट-घंटे बिजली उत्पादन का अनुमान दिया गया है। इसकी तुलना वर्ष 2050 तक भारत की अनुमानित बिजली मांग 5,250 से 10,020 टेरावाट-घंटे से की गई है।

ये तकनीकी अनुमानों पर आधारित संभावनाएं हैं, पूरे देश में बिजली उत्पादन की गारंटी नहीं। वास्तविक नतीजे जमीन, मौसम, फसल, सोलर पैनल की क्षमता और परियोजना की व्यवहार्यता पर निर्भर करेंगे।

खेती पर छाया पड़ेगी या पैदावार में भी होगा सुधार?

किसानों के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि सोलर पैनल लगाने से फसलों को पर्याप्त धूप मिलेगी या नहीं। इसका जवाब सभी फसलों के लिए एक जैसा नहीं होगा। कुछ पौधों को हल्की छाया से लाभ मिल सकता है, लेकिन अधिक धूप की जरूरत वाली फसलों पर गलत डिजाइन का असर भी पड़ सकता है।

ऊर्जा मंत्रालय की जानकारी में कुछ फसलों से जुड़े अध्ययनों का हवाला देते हुए उपयुक्त परिस्थितियों में पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक संभावित सुधार और पानी की खपत में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी की संभावना बताई गई है। इन आंकड़ों को प्रत्येक खेत और फसल के लिए निश्चित परिणाम नहीं समझना चाहिए।

Agrivoltaics Technology के तहत फसल का चुनाव मिट्टी, स्थानीय तापमान, सिंचाई, उपलब्ध रोशनी और बाजार की मांग को देखकर करना होगा। कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर छोटे स्तर पर परीक्षण करना बड़े निवेश से पहले बेहतर कदम हो सकता है।

बारिश का पानी, मिट्टी और मशीनों की आवाजाही भी जरूरी

सोलर पैनल से बिजली तो बनेगी ही, लेकिन उनकी वजह से खेत में पानी गिरने और बहने का तरीका भी बदल सकता है। यदि पानी कुछ स्थानों पर लगातार गिरता रहा, तो मिट्टी का कटाव या जलभराव जैसी समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए Agrivoltaics Technology की डिजाइन में वर्षा जल निकासी और पानी के संग्रह की व्यवस्था को शामिल करना जरूरी है।

खंभों के बीच पर्याप्त जगह, मशीनों के आने-जाने का रास्ता और फसल की ऊंचाई भी पहले तय करनी होगी। इस तरह किसान खेती की नियमित गतिविधियां कर सकेंगे और जमीन का कृषि उपयोग बनाए रख सकेंगे।

गांवों में युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते

एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं का फायदा केवल बिजली और फसल तक सीमित नहीं रह सकता। सोलर पैनलों की सफाई, तकनीकी निरीक्षण, मरम्मत, वायरिंग और नियमित रखरखाव के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है।

सरकारी अनुमान के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होने की संभावना है। यह अनुमानित क्षमता है, पहले से उपलब्ध नौकरियों की संख्या नहीं।

किसान उत्पादक संगठन यानी FPO, सहकारी संस्थाएं और पंचायतें इस दिशा में भूमिका निभा सकती हैं। गांव के युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षण मिले, तो वे परियोजना के रखरखाव और तकनीकी सेवाओं से जुड़ सकते हैं। Agrivoltaics Technology को सफल बनाने के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी भी अहम होगी।

निवेश से पहले किसानों को किन बातों पर देना होगा ध्यान?

इस तकनीक से लाभ की संभावना जरूर है, लेकिन इसमें शुरुआती खर्च और तकनीकी जोखिम भी हैं। ऊर्जा मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, ऊंचे और झुके हुए ढांचे के कारण एग्रीवोल्टाइक संयंत्र पारंपरिक जमीन पर लगाए जाने वाले सोलर संयंत्रों की तुलना में लगभग 25–30 प्रतिशत महंगे पड़ सकते हैं।

इसलिए किसान या किसान समूह निवेश से पहले जमीन का सर्वे, फसल की उपयुक्तता, कुल लागत, कर्ज की शर्तें और बिजली खरीदने वाली एजेंसी की जानकारी लें। समझौते में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कंपनी परियोजना बीच में छोड़ दे या अनुबंध समाप्त होने पर पैनल हटाने पड़ें, तो खर्च और जिम्मेदारी किसकी होगी।

Agrivoltaics Technology में किसान की जमीन और खेती की सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए। बिजली का भुगतान समय पर मिले, ग्रिड तक पहुंच उपलब्ध हो और खेती में बाधा न आए—इन शर्तों के बिना अतिरिक्त आय का अनुमान अधूरा रहेगा।

आगे क्या? खेती और ऊर्जा के बीच बनेगा नया तालमेल

सरकार का संदेश साफ है कि किसान को अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता बनने का मौका मिल सकता है। कृषि और ऊर्जा मंत्रालय के बीच सहयोग, कृषि अनुसंधान संस्थानों की मदद और फसल के अनुसार पैनल लगाने की योजना इस मॉडल को जमीन पर उतारने में अहम होंगी।

आने वाले समय में Agrivoltaics Technology उन किसानों और समूहों के लिए नया विकल्प बन सकती है, जो खेती जारी रखते हुए अतिरिक्त आमदनी के रास्ते तलाश रहे हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब जमीन का कृषि उपयोग सुरक्षित रहे, परियोजना किफायती हो और किसानों को उत्पादित बिजली का उचित भुगतान मिले।

फिलहाल पीएम-कुसुम के अगले चरण के दिशा-निर्देशों पर नजर रखना जरूरी है। योजना की वास्तविक पात्रता और आवेदन प्रक्रिया सामने आने के बाद ही किसान यह तय कर पाएंगे कि उनके खेत, फसल और बजट के लिए यह मॉडल कितना सही है।

ये भी पढ़ें: GI टैग से मगही पान की नई उड़ान! 1001 किसानों को मिली पहचान, बाजार में भी बढ़े दाम

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एग्रीवोल्टाइक तकनीक क्या है?

एग्रीवोल्टाइक तकनीक में एक ही कृषि भूमि पर सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाई जाती है और उनके नीचे खेती भी की जाती है। इसका उद्देश्य फसल उत्पादन बनाए रखते हुए सौर ऊर्जा से अतिरिक्त आय की संभावना पैदा करना है।

क्या किसान सोलर पैनल लगाकर खेती जारी रख सकते हैं?

हां, एग्रीवोल्टाइक मॉडल इसी उद्देश्य से बनाया जाता है। इसके लिए पैनलों की ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और फसल की धूप संबंधी जरूरतों के अनुसार डिजाइन तैयार करना जरूरी है।

PM-KUSUM के अगले चरण में एग्रीवोल्टाइक योजना कब शुरू होगी?

21 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी की जानकारी दी थी। आवेदन की तारीख, पात्रता और सहायता की विस्तृत शर्तों की पुष्टि आधिकारिक दिशानिर्देश जारी होने पर ही होगी।

क्या एग्रीवोल्टाइक तकनीक से किसानों की आमदनी बढ़ सकती है?

इससे फसल उत्पादन और बिजली से आय के दो संभावित स्रोत बन सकते हैं। वास्तविक कमाई परियोजना की लागत, बिजली की बिक्री दर, फसल की पैदावार, रखरखाव और भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करेगी।

सोलर पैनलों के नीचे कौन-सी फसलें उगाई जा सकती हैं?

सब्जियां, बागवानी फसलें, चारा और कुछ अन्य फसलें उपयुक्त परिस्थितियों में उगाई जा सकती हैं। सही चयन स्थानीय मौसम, मिट्टी, सूर्य की रोशनी और फसल की छाया सहन करने की क्षमता देखकर करना चाहिए।

क्या सोलर पैनल लगाने से फसल की पैदावार घट सकती है?

गलत डिजाइन या जरूरत से ज्यादा छाया पड़ने पर कुछ फसलों की पैदावार घट सकती है। इसलिए पैनलों की व्यवस्था और फसल का चयन वैज्ञानिक सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए।

एग्रीवोल्टाइक परियोजना लगाने में कितना खर्च आता है?

इसकी लागत जमीन, सोलर क्षमता, पैनलों की ऊंचाई, संरचना, वायरिंग और ग्रिड कनेक्शन पर निर्भर करती है। ऊंचे ढांचे वाले एग्रीवोल्टाइक सिस्टम पारंपरिक जमीन पर लगाए जाने वाले सोलर सिस्टम से महंगे हो सकते हैं।

क्या छोटे और सीमांत किसान भी इस तकनीक को अपना सकते हैं?

छोटे किसान किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी समितियों या दूसरे उपयुक्त सामूहिक मॉडल के जरिए इसकी संभावनाएं तलाश सकते हैं। हालांकि, वास्तविक पात्रता और आर्थिक सहायता के लिए संबंधित योजना के आधिकारिक दिशा-निर्देश देखना जरूरी है।

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