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अरहर, तूर या अरहर की उन्नत किस्में: कम लागत में पाएं ज्यादा उत्पादन (Best Pigeon Pea, Toor or Arhar Varieties in India)

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Table of Contents

अरहर की उन्नत किस्में, अरहर की खेती, Arhar Farming in India, Best Pigeon Pea Varieties, Tur Dal Kisme, Pigeon Pea Seeds, Organic Arhar Farming, ICAR Arhar Varieties, Pusa Arhar Seeds, High Yield Tur Varieties, अरहर की वैरायटी, अरहर के रोग और उपचार.

किसान भाइयों, अगर आप अरहर की खेती से ज्यादा उत्पादन, बेहतर दाम और कम रोग चाहते हैं, तो अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) चुनना बहुत जरूरी है। भारत में अलग-अलग राज्यों की मिट्टी, मौसम और बारिश को ध्यान में रखते हुए ICAR और IIPR द्वारा कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं, जो कम समय में ज्यादा पैदावार देती हैं और रोगों के प्रति काफी हद तक प्रतिरोधी होती हैं।
इस लेख में हम अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) को समझेंगे, साथ ही अवधि, उत्पादन, रोग प्रतिरोध और ऑर्गेनिक खेती के तरीके पर भी विस्तार से बात करेंगे।

ICAR और IIPR द्वारा विकसित प्रमुख किस्में (Major Varieties Developed by ICAR and IIPR)

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (IIPR) ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए अरहर की उन्नत किस्में विकसित की हैं। इन संस्थानों का मुख्य उद्देश्य ऐसी किस्में तैयार करना है जो कम समय में तैयार हों और जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो।

उदाहरण के लिए, ‘पूसा-992’ एक बहुत ही प्रचलित किस्म है। यह किस्म उत्तर पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जल्दी पकने वाली किस्म है, जो लगभग 140 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे किसान भाई रबी के सीजन में गेहूं की बुवाई समय पर कर सकते हैं।

इसके अलावा ‘आईपीए 203’ (IPA 203) भी एक शानदार किस्म है जो IIPR द्वारा विकसित की गई है। यह किस्म उकठा रोग (Wilt) के प्रति सहनशील है। जब हम अरहर की उन्नत किस्में चुनते हैं, तो हमें यह देखना चाहिए कि वह हमारे क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा अनुशंसित हो। इन वैज्ञानिक किस्मों की पैदावार सामान्य बीजों के मुकाबले 15-20% अधिक होती है।

उत्तर भारत के लिए अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties for North India)

उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बिहार के किसान भाइयों के लिए अरहर की उन्नत किस्में चुनना थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि यहाँ फसल चक्र का ध्यान रखना पड़ता है। यहाँ के किसानों को ऐसी किस्मों की जरुरत होती है जो गेहूं की बुवाई से पहले खेत खाली कर दें। यहां के लिए UPAS-120, नरेंद्र अरहर-1, Pusa-992 और मालवीय अरहर-15 काफी लोकप्रिय हैं। इस क्षेत्र के लिए ‘यूपीएएस-120’ (UPAS-120) बहुत ही लोकप्रिय किस्म है। यह काफी जल्दी पकती है (लगभग 125-135 दिन) और इसकी पैदावार 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।

दूसरी महत्वपूर्ण किस्म ‘पूसा अगेती’ है। यह किस्म भी दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए बेहतरीन है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान भाइयों के लिए ‘बहार’ और ‘मालवीय विकास’ जैसी अरहर की उन्नत किस्में बहुत अच्छा परिणाम देती हैं। हालांकि ‘बहार’ किस्म देर से पकती है (लगभग 250 दिन), लेकिन इसकी पैदावार 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। अगर आप गेहूं की खेती नहीं करते हैं, तो लंबी अवधि वाली ये किस्में आपको बंपर मुनाफा दे सकती हैं। सही अरहर की उन्नत किस्में चुनने से उत्तर भारत के किसान पाले और कोहरे के नुकसान से भी बच सकते हैं।

इन अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) की अवधि लगभग 150–160 दिन होती है और औसतन 18–22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती हैं। ये किस्में विल्ट (Wilt) और स्टेरिलिटी मोजेक जैसी बीमारियों के प्रति काफी हद तक सहनशील हैं।

दक्षिण भारत के लिए अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties for South India)

महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में BSMR-736, Asha (ICPL-87119), TS-3R और Maruti जैसी किस्में ज्यादा अपनाई जाती हैं।
ये अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) 170–190 दिन में पकती हैं और 20–25 क्विंटल/हेक्टेयर तक उत्पादन देती हैं। खास बात यह है कि ये किस्में सूखा सहनशील हैं और कम बारिश में भी अच्छी पैदावार देती हैं।
दक्षिण भारत में इंटरक्रॉपिंग (अरहर + सोयाबीन/मक्का) के साथ इन किस्मों से किसानों की आमदनी और बढ़ जाती है।

पूर्वी भारत के लिए अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties for East India)

बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में ज्यादा नमी और भारी मिट्टी पाई जाती है। यहां के लिए ICP-8863, NDA-1, Birsa Arhar-1 और Rajendra Arhar-1 बेहतर मानी जाती हैं।
इन अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) की अवधि 150–170 दिन होती है और औसतन 16–20 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन देती हैं।
ये किस्में जड़ सड़न और फंगल रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील होती हैं, जिससे पूर्वी भारत के किसानों को स्थिर उत्पादन मिलता है।

पश्चिमी व शुष्क क्षेत्रों के लिए अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties for Dry Regions)

राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में ICPL-87, GT-101 और PKV-TARA अच्छी साबित हुई हैं।
ये अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) कम पानी में भी 15–18 क्विंटल/हेक्टेयर तक उत्पादन देती हैं। इनकी जड़ें गहरी होती हैं, जिससे ये सूखे को सहन कर लेती हैं।
कम लागत और कम सिंचाई की जरूरत होने के कारण ये किस्में शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए फायदे का सौदा हैं।

ICAR / IIPR द्वारा विकसित अरहर की उन्नत किस्में (ICAR & IIPR Pigeon Pea Varieties)

ICAR और IIPR (कानपुर) ने कई वैज्ञानिक तरीके से विकसित किस्में दी हैं जैसे Pusa-2001, Pusa-992, ICPL-87119 (Asha)
इन अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties in India) में उच्च उत्पादन, एकसार दाने और रोग प्रतिरोध प्रमुख विशेषता है। इनका उत्पादन 22–25 क्विंटल/हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।
सरकारी बीज होने के कारण इन पर किसानों को ज्यादा भरोसा रहता है और बाजार में भी अच्छा भाव मिलता है।

अवधि, उत्पादन और रोग प्रतिरोध क्षमता (Duration, Yield, and Disease Resistance)

किसी भी किस्म का चयन करते समय तीन मुख्य बातें ध्यान रखनी चाहिए: फसल की अवधि, उसका कुल उत्पादन और रोगों से लड़ने की ताकत। अरहर की उन्नत किस्में मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में आती हैं: अगेती (120-140 दिन), मध्यम (150-180 दिन) और पछेती (200 से अधिक दिन)।

अगेती किस्मों का उत्पादन औसतन 15-18 क्विंटल/हेक्टेयर होता है, जबकि पछेती किस्में 25-30 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज देती हैं। लेकिन सबसे जरुरी है रोग प्रतिरोध। अरहर में ‘उकठा’ (Wilt) और ‘बांझपन’ (Sterility Mosaic) सबसे खतरनाक रोग हैं। जब आप बाजार में अरहर की उन्नत किस्में खरीदने जाएं, तो पैकेट पर जरूर देखें कि वह रोग प्रतिरोधी है या नहीं। जैसे, ‘पूसा-991’ और ‘आजाद’ किस्में रोगों से लड़ने में सक्षम हैं।

यदि आप ऐसी अरहर की उन्नत किस्में नहीं चुनते जिनमें रोग प्रतिरोध क्षमता हो, तो खड़ी फसल सूखने का डर बना रहता है। सही अवधि का चुनाव आपके अगले फसल चक्र को भी सुरक्षित करता है। इसलिए बीज खरीदते समय दुकानदार या कृषि अधिकारी से अवधि और रोग प्रतिरोध के बारे में स्पष्ट पूछें।

अरहर की खेती में ऑर्गेनिक तरीके (Organic Methods in Pigeon Pea Farming)

आज के दौर में रसायनों के दुष्प्रभावों को देखते हुए ऑर्गेनिक खेती समय की मांग है। अरहर की उन्नत किस्में भी ऑर्गेनिक तरीके से उगाने पर बहुत अच्छा और स्वास्थ्यवर्धक उत्पादन देती हैं। ऑर्गेनिक खेती में सबसे पहला कदम है बीज उपचार।

बुवाई से पहले बीजों को ‘राइजोबियम कल्चर’ (Rhizobium Culture) और ‘ट्राइकोडर्मा’ (Trichoderma) से उपचारित करें। राइजोबियम जड़ों में गांठें बनाता है जो वायुमंडल से नत्रजन खींचकर पौधों को देती हैं, जिससे यूरिया की जरुरत नहीं पड़ती। कीटों से बचाव के लिए रसायनों की जगह ‘नीम का तेल’ (Neem Oil) या ‘नीम की खली’ का प्रयोग करें।

फली छेदक कीट (Pod Borer) के नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप अरहर की उन्नत किस्में ऑर्गेनिक खाद जैसे वर्मीकम्पोस्ट के साथ उगाते हैं, तो दाल का स्वाद और गुणवत्ता दोनों बढ़ जाते हैं। बाजार में ऑर्गेनिक अरहर दाल की कीमत सामान्य दाल से 20-30% ज्यादा मिलती है। इसलिए, अरहर की उन्नत किस्में लगाते समय रासायनिक खाद कम करें और जैविक तरीकों को अपनाएं ताकि खेत की मिट्टी भी उपजाऊ बनी रहे।

सरकारी योजनाएँ और किसान क्रेडिट कार्ड (Government Schemes and KCC)

खेती में मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए किसान सरकारी योजनाओं का भी लाभ उठा सकते हैं। ये योजनाएँ खेती की लागत को कम करने और पूंजी (Capital) की व्यवस्था करने में मदद करती हैं।

भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली कई योजनाएँ हैं, जो किसानों को सब्ज़ी और बागवानी (Horticulture) फसलों के लिए सब्सिडी (Subsidy) देती हैं।

  1. राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM): इस योजना के तहत, आलू की खेती के लिए उन्नत बीज, प्लांटर मशीन, कोल्ड स्टोरेज बनाने और माइक्रो-इरिगेशन सिस्टम लगाने पर सब्सिडी मिल सकती है।
  2. प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): यह योजना सीधे किसानों के खाते में सालाना ₹6,000 की वित्तीय सहायता देती है, जिसका उपयोग किसान खेती के छोटे-मोटे ख़र्चों के लिए कर सकते हैं।

सबसे ज़रूरी है किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card – KCC)। केसीसी के ज़रिए किसान बहुत कम ब्याज दर पर (लगभग 4% प्रति वर्ष) खेती के लिए लोन (Loan) ले सकते हैं। इस पैसे का उपयोग आलू के बीज, खाद, कीटनाशक खरीदने या बुवाई के ख़र्चों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। इससे किसान को तुरंत पैसा उधार लेने या अपनी बचत को ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। किसान को हमेशा अपने क्षेत्र के कृषि विभाग या बागवानी विभाग से संपर्क करके नवीनतम योजनाओं और सब्सिडी के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)

किसान भाइयों, खेती में लाभ कमाने के लिए परंपरागत तरीकों से हटकर वैज्ञानिक सोच अपनाना जरुरी है। अरहर की उन्नत किस्में न केवल आपकी पैदावार बढ़ाएंगी बल्कि बिमारियों पर होने वाले खर्च को भी कम करेंगी। चाहे आप उत्तर भारत से हों या दक्षिण से, अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म का ही चयन करें। IIPR और ICAR द्वारा प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करें। उम्मीद है कि यह जानकारी आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगी।

FAQ: अरहर की उन्नत किस्में (Best Pigeon Pea Varieties) पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल।

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