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मॉनसून (Monsoon) का बदला रंग…. पहले था किसानों के लिए वरदान, अब बन रहा है किसानों के लिए बड़ी आफत!

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मॉनसून (Monsoon) की कहानी करोड़ों साल पुरानी है, लेकिन इसकी बदलती चाल आज भी वैज्ञानिकों को हैरान करती है। बेवक्त बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं किसानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। भारत में मानसून केवल बारिश का मौसम नहीं है, बल्कि किसानों की खेती, लोगों की रोजी-रोटी और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन इसकी बदलती चाल और रहस्यमयी प्रकृति आज भी पूरी तरह समझ नहीं आ सकी है।

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बीते कुछ वर्षों में मानसून का व्यवहार काफी बदल गया है। कहीं अचानक मूसलाधार बारिश और बाढ़ की स्थिति बन जाती है, तो कहीं लंबे समय तक बारिश न होने से सूखे जैसी समस्या खड़ी हो जाती है। इस बदलते मौसम ने किसानों, प्रशासन और आम लोगों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। खेती बाड़ी से जुड़ी जानकारी के लिए Bihar Agro से जुड़े रहें।

मॉनसून से बढ़ते खतरे को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2022 में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया था। आदेश के मुताबिक मुख्य सचिव से लेकर जिलाधिकारियों तक किसी भी अधिकारी को पूरे मानसून सीजन के दौरान छुट्टी लेने की अनुमति नहीं थी। यह फैसला इस बात का संकेत है कि अब मानसून केवल बारिश का मौसम नहीं रह गया, बल्कि आपदाओं का दौर भी बनता जा रहा है। भूस्खलन, बादल फटना और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में मौसम ने लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में जुलाई 2022 तक केवल 3.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 142.7 मिलीमीटर बारिश होती है। बारिश में भारी कमी के कारण धान की रोपाई पर बड़ा असर पड़ा। दूसरी ओर असम, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में बाढ़ ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। कहीं खेत सूखे से जूझ रहे हैं तो कहीं पानी की तबाही से नुकसान हो रहा है। यही मॉनसून का बदला हुआ और अनिश्चित रूप है, जो किसानों और आम लोगों दोनों के लिए चुनौती बन गया है।

भारत में मॉनसून (Monsoon) के दो प्रमुख रूप

भारत में मुख्य तौर पर दो तरह के मॉनसून देखने को मिलते हैं। इनमें सबसे अहम दक्षिण-पश्चिम मानसून है, जो हर साल जून महीने में केरल के तट से दस्तक देता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैल जाता है। यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आता है और देश की अधिकांश खेती इसी बारिश पर निर्भर रहती है। भारत में होने वाली कुल वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी मॉनसून से मिलता है।

दूसरा मॉनसून पूर्वोत्तर या शीतकालीन मानसून कहलाता है। यह सितंबर और अक्टूबर के दौरान सक्रिय होता है और खासकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा केरल के कुछ इलाकों में अच्छी बारिश कराता है।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल पहुंचता है और सितंबर के मध्य तक राजस्थान से वापस लौटना शुरू कर देता है। हालांकि मौसम की बदलती परिस्थितियों के कारण इसके आने और जाने का समय हर साल थोड़ा अलग हो सकता है।

मॉनसून (Monsoon) कैसे बनता है?

सरल भाषा में समझें तो मॉनसून का मतलब हवाओं की दिशा में बदलाव होना है। हर साल मार्च के बाद सूर्य उत्तर की ओर बढ़ने लगता है, जिससे भारत और आसपास का भूभाग तेजी से गर्म होने लगता है। गर्मी बढ़ने पर यहां कम वायुदाब (लो प्रेशर) का क्षेत्र बन जाता है।

इस कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्द्ध से नमी से भरी हवाएं खिंची चली आती हैं। इसी दौरान इंटर ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस जोन (ITCZ) सक्रिय होता है, जो इन हवाओं को भारत की तरफ मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिणामस्वरूप ये हवाएं दक्षिण-पश्चिम दिशा से भारत में प्रवेश करती हैं और व्यापक बारिश कराती हैं।

मॉनसून को मजबूत बनाने में तिब्बती पठार की भी बड़ी भूमिका होती है। गर्मियों में यह पठार बेहद गर्म हो जाता है और एक विशाल पंप की तरह काम करते हुए समुद्रों से नमी खींचने में मदद करता है। यही नमी बादलों के रूप में बदलकर देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा कराती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय मॉनसून की शुरुआत लगभग 8 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। हालांकि आज जिस रूप में हम मॉनसून को देखते हैं, उसका विकास करीब 2 करोड़ वर्ष पहले तिब्बती पठार के ऊंचा होने के बाद हुआ।

मॉनसून (Monsoon) को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण

मॉनसून केवल स्थानीय मौसम पर निर्भर नहीं करता, बल्कि दुनिया भर में होने वाले कई प्राकृतिक बदलाव भी इसकी चाल को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि कभी बारिश सामान्य से ज्यादा होती है तो कभी उम्मीद से कम।

अल-नीनो (El Niño) के दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिसका असर भारत के मॉनसून पर पड़ता है और अक्सर बारिश कम हो जाती है।

ला-नीना (La Niña) इसकी उल्टी स्थिति है। इसमें समुद्र का पानी ठंडा रहता है, जिससे भारत में अच्छी और सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।

इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी मॉनसून का एक महत्वपूर्ण कारक है। हिंद महासागर के अलग-अलग हिस्सों में तापमान का अंतर यह तय करने में मदद करता है कि बारिश अच्छी होगी या कमजोर।

वहीं मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) एक ऐसा मौसमीय चक्र है, जो लगभग 30 से 40 दिनों में सक्रिय होता है और बारिश की मात्रा तथा तीव्रता को प्रभावित करता है।

इन वैश्विक कारकों के अलावा हिमालय और पश्चिमी घाट जैसी पर्वत श्रृंखलाएं भी मानसून की दिशा और बारिश के पैटर्न को प्रभावित करती हैं। इतने सारे कारकों के एक साथ काम करने के कारण मानसून की पूरी प्रक्रिया काफी जटिल बन जाती है और वैज्ञानिक आज भी इसके कई पहलुओं को गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

मानसून क्या होता है?

मानसून एक मौसमी पवन प्रणाली है, जिसमें हवाओं की दिशा मौसम के अनुसार बदलती है। भारत में यही हवाएं समुद्र से नमी लेकर आती हैं और बारिश कराती हैं।

भारत में मुख्य रूप से कितने प्रकार के मानसून होते हैं?

भारत में दो प्रमुख प्रकार के मानसून होते हैं। पहला दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो जून से सितंबर तक अधिकांश बारिश लाता है, और दूसरा पूर्वोत्तर या शीतकालीन मानसून, जो मुख्य रूप से तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा करता है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में कब प्रवेश करता है?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल पहुंचता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैल जाता है।

मानसून भारत की अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। अच्छी मानसूनी बारिश से फसल उत्पादन बढ़ता है, जिससे किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।

अल-नीनो (El Niño) का मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है?

अल-नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे भारत में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।

ला-नीना (La Niña) क्या है और इसका क्या असर होता है?

ला-नीना के दौरान समुद्र का पानी सामान्य से अधिक ठंडा रहता है। इससे भारत में सामान्य या अधिक बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।

मानसून का संबंध जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से कैसे है?

जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का पैटर्न बदल रहा है। कहीं अचानक अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बन रही है।

मानसून बनने में तिब्बती पठार की क्या भूमिका है?

गर्मियों में तिब्बती पठार तेजी से गर्म होकर कम दबाव का क्षेत्र बनाता है, जो समुद्र से नमी वाली हवाओं को भारत की ओर आकर्षित करने में मदद करता है।

मानसून शब्द की उत्पत्ति कहां से हुई है?

मानसून शब्द अरबी भाषा के “मौसिम” शब्द से निकला है, जिसका अर्थ “मौसम” या “ऋतु” होता है।

मानसून को वैज्ञानिक आज भी पूरी तरह क्यों नहीं समझ पाए हैं?

मानसून पर अल-नीनो, ला-नीना, IOD, MJO, हिमालय, समुद्री तापमान और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इन सभी की जटिलता के कारण मानसून आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती बना हुआ है।

मानसून किसानों के लिए वरदान और अभिशाप दोनों कैसे बन सकता है?

समय पर और संतुलित बारिश किसानों के लिए वरदान साबित होती है, जबकि अत्यधिक बारिश, बाढ़ या सूखा फसलों को नुकसान पहुंचाकर किसानों की आय पर बुरा असर डाल सकता है।

भविष्य में मानसून से जुड़ी चुनौतियों से कैसे निपटा जा सकता है?

बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण, फसल बीमा, आधुनिक सिंचाई तकनीक और जलवायु-अनुकूल खेती अपनाकर मानसून से जुड़ी चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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