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राजू शेट्टी का चीनी मिलों को अल्टीमेटम: गन्ने का भाव ₹5,000 प्रति टन करने की मांग, कराड में तेज हुआ किसान आंदोलन

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Sugarcane Farmers Protest: ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, 15 अक्टूबर 2026 को स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी ने महाराष्ट्र के कराड स्थित कृष्णा सहकारी चीनी मिल के बाहर प्रदर्शन किया। संगठन की मांग है कि गन्ने का भाव ₹5,000 प्रति टन, चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य ₹50 प्रति किलो और इथेनॉल का खरीद मूल्य ₹70 प्रति लीटर निर्धारित किया जाए। मांगों पर निर्णय होने तक चीनी मिलों में गन्ने की पेराई रोकने का दबाव भी बनाया जा रहा है।

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ध्यान रहे, ये किसान संगठन की मांगें हैं, सरकार द्वारा घोषित नई दरें नहीं। केंद्र सरकार ने 2026-27 के चीनी सीजन के लिए 10.25% बेसिक रिकवरी दर पर गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) ₹365 प्रति क्विंटल मंजूर किया है।

राजू शेट्टी का दो टूक संदेश: ₹5,000 टन गन्ने का भाव नहीं तो चीनी मिलों की पेराई पर रोक!

महाराष्ट्र में गन्ना किसानों के लिए उचित भाव की मांग ने जोर पकड़ लिया है। स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी ने कराड स्थित कृष्णा सहकारी चीनी मिल के बाहर प्रदर्शन कर चीनी उद्योग और सरकार के सामने अपनी मांगें रखी हैं। उनका कहना है कि किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केवल गन्ने का उचित भाव तय करना काफी नहीं है, बल्कि चीनी की बिक्री कीमत और इथेनॉल के खरीद मूल्य पर भी फैसला होना चाहिए।

इस Sugarcane Farmers Protest का असर महाराष्ट्र के चीनी उद्योग के आगामी पेराई सीजन पर पड़ सकता है। संगठन ने मांगें पूरी होने तक मिलों में पेराई रोकने का दबाव बनाया है। हालांकि, प्रदर्शन के बाद सभी चीनी मिलों के बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

Sugarcane Farmers Protest: गन्ने के भाव पर क्यों आर-पार की लड़ाई?

किसान नेता राजू शेट्टी लंबे समय से गन्ने के उचित मूल्य और चीनी उद्योग की आर्थिक नीतियों में बदलाव की मांग उठाते रहे हैं। इस बार उनका जोर तीन प्रमुख मुद्दों पर है—गन्ने का भाव, चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य और इथेनॉल का खरीद मूल्य।

राजू शेट्टी आंदोलन: 15 अक्टूबर को कराड में कृष्णा सहकारी चीनी मिल के बाहर हुए प्रदर्शन में संगठन के कार्यकर्ताओं ने किसानों के हित में जल्द फैसला लेने की मांग की। रिपोर्टों के मुताबिक, शेट्टी ने कृष्णा के अलावा क्रांति, सोनहिरा और हुतात्मा सहकारी चीनी मिलों के बाहर भी विरोध प्रदर्शन किए।

राजू शेट्टी का तर्क है कि जब चीनी उद्योग से जुड़े उत्पादों के भाव किसानों को बेहतर भुगतान देने के लिए पर्याप्त नहीं होते, तो गन्ना उत्पादकों को उनकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता। यही वजह है कि sugarcane farmers protest अब केवल गन्ने की खरीद तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे चीनी उद्योग की मूल्य व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बन गया है।

₹5,000 प्रति टन गन्ना भाव: संगठन ने रखीं 3 बड़ी मांगें

गन्ना किसान आंदोलन महाराष्ट्र: शेतकरी संगठन ने सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं।

मुख्य मुद्दासंगठन की मांग
गन्ने का भाव₹5,000 प्रति टन
चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य₹50 प्रति किलो
इथेनॉल का खरीद मूल्य₹70 प्रति लीटर

ये तीनों प्रस्ताव संगठन की मांगें हैं। इन्हें सरकार द्वारा लागू की गई नई दरें नहीं समझना चाहिए।

राजू शेट्टी के मुताबिक, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (Minimum Selling Price या MSP, जैसा इस संदर्भ में कहा जा रहा है) में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं होने से मिलों की कमाई और किसानों को भुगतान करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसलिए संगठन चाहता है कि चीनी और इथेनॉल की कीमतों से जुड़े फैसले को गन्ना उत्पादकों के हितों के साथ जोड़कर देखा जाए।

इस Sugarcane Farmers Protest में किसानों के लिए ₹5,000 प्रति टन का भाव सबसे प्रमुख मांग के रूप में सामने आया है। यदि इस पर सहमति बनती है, तो वास्तविक भुगतान, रिकवरी और लागू नियमों के अनुसार उसकी शर्तें तय करना भी जरूरी होगा।

चीनी का MSP ₹50 किलो करने पर क्यों है जोर?

चीनी उद्योग में न्यूनतम बिक्री मूल्य का महत्व इसलिए है क्योंकि यह वह न्यूनतम कीमत है जिस पर मिलों को चीनी बेचने की अनुमति से जुड़ा सरकारी ढांचा लागू होता है। किसानों और संगठन का तर्क है कि यदि चीनी की बिक्री कीमत में बढ़ोतरी नहीं होती, तो गन्ने का बेहतर भाव देने के लिए मिलों पर आर्थिक दबाव बना रहता है।

संगठन चाहता है कि चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य ₹50 (चीनी MSP 50 रुपये) प्रति किलो किया जाए। इसके अनुसार, मिलों को मिलने वाली कमाई में सुधार होने पर गन्ना उत्पादकों को ज्यादा भुगतान करने की गुंजाइश बनेगी।

हालांकि, इसका अंतिम असर चीनी के बाजार भाव, उत्पादन लागत, मिलों के खर्च और सरकारी नीति पर निर्भर करेगा। इसलिए केवल MSP बढ़ाने से हर किसान को तुरंत गन्ने का भाव 5000 रुपये प्रति टन मिलना तय नहीं हो जाता। इस Sugarcane Farmers Protest में उठाया गया सवाल यही है कि चीनी उद्योग के आर्थिक ढांचे में ऐसा कौन-सा बदलाव हो जिससे किसानों का भुगतान बेहतर हो सके।

इथेनॉल का भाव ₹70 प्रति लीटर: किसानों को कैसे मिलेगा फायदा?

चीनी मिलें गन्ने से चीनी बनाने के अलावा इथेनॉल जैसे उत्पादों के कारोबार से भी जुड़ी हैं। इथेनॉल की खरीद कीमत और उत्पादन से मिलने वाली आमदनी का असर मिलों की कुल आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।

राजू शेट्टी (Raju Shetti) और उनका संगठन इथेनॉल का खरीद मूल्य ₹70 प्रति लीटर तय करने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे चीनी मिलों को बेहतर आर्थिक आधार मिलेगा और किसानों को उचित गन्ना भाव देने की संभावना बढ़ सकती है।

लेकिन इथेनॉल की कीमत अलग-अलग श्रेणियों, कच्चे माल और सरकारी खरीद व्यवस्था के अनुसार तय हो सकती है। इसलिए इथेनॉल का भाव 70 रुपये प्रति लीटर की मांग को वर्तमान में लागू समान सरकारी दर मानना सही नहीं होगा।

Sugarcane Farmers Protest के दौरान चीनी MSP और इथेनॉल की कीमत को एक साथ उठाना इसी बात का संकेत है कि संगठन गन्ना किसानों की आय बढ़ाने के लिए पूरे उद्योग के आर्थिक पक्ष में बदलाव चाहता है।

समय से पहले पेराई शुरू होने से नुकसान का सवाल

गन्ने की कटाई और पेराई कब शुरू होनी चाहिए, यह भी आंदोलन का अहम मुद्दा है। राजू शेट्टी का कहना है कि अगर कम परिपक्व गन्ने की जल्दी पेराई की जाती है, तो किसानों के साथ-साथ मिलों को भी नुकसान हो सकता है।

गन्ने का वजन और उसमें से निकलने वाली चीनी की मात्रा उसकी किस्म, सिंचाई, मौसम, फसल की उम्र और कटाई के समय पर निर्भर करती है। इसलिए समय से पहले कटाई का नुकसान हर खेत में एक जैसा नहीं होगा।

संगठन ने शुरुआती पेराई से किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए प्रति टन ₹500 अनुदान की मांग भी उठाई है। यदि किसी किसान का उत्पादन 40 टन प्रति एकड़ हो, तो ₹500 प्रति टन के हिसाब से सहायता की गणना ₹20,000 प्रति एकड़ होगी। यह केवल उदाहरण के आधार पर निकाली गई राशि है, कोई स्वीकृत सरकारी मुआवजा नहीं।

इस Sugarcane Farmers Protest में अनुदान की मांग का उद्देश्य किसानों को संभावित नुकसान से राहत दिलाना है। लेकिन सहायता का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब सरकार योजना, पात्रता और भुगतान की शर्तों पर फैसला करेगी।

केंद्र सरकार की समिति पर भी निगाहें

गन्ना उत्पादकों के मुद्दों पर केंद्र सरकार के स्तर पर चर्चा हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, किसानों की मांगों की समीक्षा के लिए कृषि अर्थशास्त्री रमेश चंद की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। संगठन की ओर से समिति बनाकर निर्णय टालने के बजाय समयबद्ध समाधान की मांग की जा रही है।

किसानों की चिंता यह है कि यदि पेराई सीजन शुरू होने के बाद भी कीमतों पर स्पष्ट निर्णय नहीं होता, तो भुगतान को लेकर तनाव बढ़ सकता है। वहीं, मिलों के लिए भी गन्ने की खरीद, मजदूरों की व्यवस्था, परिवहन और उत्पादन बनाए रखना जरूरी है।

इसलिए Sugarcane Farmers Protest का समाधान खोजते समय सरकार को किसानों की आय के साथ चीनी उद्योग और उससे जुड़े श्रमिकों पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना होगा।

चीनी मिलों को रोकने की चेतावनी, लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं

राजू शेट्टी ने मांगें पूरी होने तक मिलों में पेराई रोकने का दबाव बनाया है। उनका कहना है कि बिना ठोस फैसले के सीजन आगे बढ़ाना किसानों की मांगों को नजरअंदाज करने जैसा होगा।

दूसरी ओर, मिल प्रतिनिधियों ने चिंता जताई है कि गन्ना काटने वाले मजदूर पहले ही काम के लिए पहुंच चुके हैं। खासकर सूखे से प्रभावित क्षेत्रों से आए मजदूरों की रोजी-रोटी पेराई रुकने से प्रभावित हो सकती है। मिल प्रशासन ने इस प्रस्ताव पर अपने अध्यक्षों और निदेशकों से चर्चा करने की बात कही है।

ऐसे में आंदोलन के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं—किसानों की मांगों को मजबूती से उठाना और यह सुनिश्चित करना कि गन्ना कटाई, परिवहन तथा मजदूरों की आजीविका पर अनावश्यक असर न पड़े।

सूखे और गन्ना ढुलाई का मुद्दा भी बना अहम

महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में सूखे जैसी परिस्थितियों के बीच गन्ने की उपलब्धता और परिवहन का सवाल महत्वपूर्ण है। अगर फसल कमजोर है या किसान को समय पर उचित भुगतान नहीं मिलता, तो उसका असर अगली फसल की तैयारी और घरेलू खर्च पर भी पड़ सकता है।

इसके साथ गन्ना ढुलाई करने वाले ट्रकों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की सड़क सुरक्षा का मुद्दा भी उठता है। परिवहन नियमों का पालन, वाहनों की उचित स्थिति और सुरक्षित आवाजाही प्रशासन तथा संबंधित संचालकों की जिम्मेदारी है।

Sugarcane Farmers Protest के दौरान इन मुद्दों को भी चर्चा में लाना जरूरी है, क्योंकि गन्ना उद्योग केवल किसान और मिल तक सीमित नहीं है। इससे मजदूर, ट्रांसपोर्टर, स्थानीय व्यापारी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कई दूसरे हिस्से जुड़े हैं।

किसानों को अब आगे क्या देखना चाहिए?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि केंद्र सरकार और चीनी मिल प्रबंधन तीन प्रमुख मांगों पर क्या कदम उठाते हैं। किसानों को किसी भी नई दर या अनुदान को लेकर आधिकारिक घोषणा और संबंधित आदेश का इंतजार करना चाहिए।

जब तक सरकार या संबंधित प्राधिकरण लिखित रूप में निर्णय जारी नहीं करते, तब तक ₹5,000 प्रति टन गन्ना भाव, ₹50 प्रति किलो चीनी MSP, ₹70 प्रति लीटर इथेनॉल मूल्य और ₹500 प्रति टन अनुदान को मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, कराड का प्रदर्शन गन्ने की कीमत, चीनी उद्योग की आय और किसानों की आर्थिक सुरक्षा पर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा है। अब यह देखना होगा कि बातचीत से कोई व्यावहारिक समाधान निकलता है या Sugarcane Farmers Protest आगे और तेज होता है।

ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों को दिवाली से पहले ₹5,000 की राहत, 305 तालुकों तक बढ़ी सूखे की सूची

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राजू शेट्टी गन्ने का भाव कितना करने की मांग कर रहे हैं?

राजू शेट्टी के नेतृत्व वाला स्वाभिमानी शेतकरी संगठन गन्ने का भाव ₹5,000 प्रति टन करने की मांग कर रहा है।

चीनी का MSP ₹50 प्रति किलो करने की मांग क्यों हो रही है?

संगठन का तर्क है कि चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत बढ़ने से मिलों की कमाई में सुधार हो सकता है और किसानों को बेहतर गन्ना भाव देने की गुंजाइश बढ़ सकती है।

इथेनॉल का नया भाव कितना मांगा गया है?

संगठन इथेनॉल का खरीद मूल्य ₹70 प्रति लीटर करने की मांग कर रहा है। यह मांग है, घोषित नई सरकारी दर नहीं।

2026-27 में गन्ने का सरकारी FRP कितना है?

केंद्र सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए 10.25% बेसिक रिकवरी दर पर गन्ने का FRP ₹365 प्रति क्विंटल मंजूर किया है। वास्तविक भुगतान रिकवरी और लागू नियमों के अनुसार प्रभावित हो सकता है।

क्या महाराष्ट्र की सभी चीनी मिलें बंद हो गई हैं?

उपलब्ध रिपोर्टों से सभी मिलों के बंद होने की पुष्टि नहीं होती। राजू शेट्टी ने पेराई रोकने की मांग की है, लेकिन हर मिल की वास्तविक स्थिति अलग से सत्यापित करनी चाहिए।

₹500 प्रति टन अनुदान से किसान को कितना पैसा मिलेगा?

उदाहरण के तौर पर, 40 टन प्रति एकड़ उत्पादन पर ₹20,000 बनते हैं। यह संगठन की मांग पर आधारित गणना है, स्वीकृत मुआवजे की घोषणा नहीं।

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