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किसान भाइयों, खेती अब सिर्फ ज्यादा उत्पादन लेने का खेल नहीं रह गई है। आज किसान यह भी सोच रहा है कि मिट्टी कितने साल तक उपजाऊ रहेगी, खेती की लागत कैसे घटेगी और फसल में इस्तेमाल होने वाले इनपुट का पर्यावरण पर कितना असर पड़ेगा। यही वजह है कि देश के खेतों में धीरे-धीरे जैविक और सूक्ष्मजीव आधारित विकल्पों की मांग बढ़ रही है।
Indian farmers are adopting organic alternatives and biopesticides: सबसे दिलचस्प बात यह है कि पिछले करीब तीन दशकों में भारत में जैव और नीम आधारित कीटनाशकों के इस्तेमाल में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1994-95 में इनका उपयोग केवल 123 मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 7,649 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड तक पहुंच गया। यानी लगभग 62 गुना की बढ़ोतरी।

यह बदलाव केवल किसी एक उत्पाद की बिक्री बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किसान अब फसल सुरक्षा के लिए नए विकल्पों को भी गंभीरता से देख रहे हैं। कृषि से जुड़ी ऐसी ही नई जानकारी के लिए किसान भाइयों Bihar Agro को विजिट करें।
Indian Farmers are Adopting Organic Alternatives and Biopesticides, खेतों में क्यों बदल रही है सोच?
Indian farmers are adopting organic alternatives and biopesticides — यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे कई वजहें हैं। लगातार बढ़ती खेती की लागत, कुछ कीटों में रासायनिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध, लाभकारी कीटों को बचाने की जरूरत और खाद्य पदार्थों में रासायनिक अवशेषों को लेकर बढ़ती जागरूकता ने किसानों को विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। कई किसान अब नीम आधारित उत्पादों, ट्राइकोडर्मा, ब्यूवेरिया बैसियाना, मेटाराइजियम और दूसरे जैविक एजेंटों को अपनी फसल सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं।
हालांकि भारतीय किसान जैविक विकल्प और बायो-पेस्टिसाइड्स अपना रहे हैं– का मतलब यह नहीं है कि किसान पूरी तरह रासायनिक कृषि छोड़ रहे हैं। असल बदलाव यह है कि जरूरत के मुताबिक अलग-अलग तकनीकों को मिलाकर इस्तेमाल करने पर जोर बढ़ रहा है।
62 गुना उछाल ने दिखाई खेती की नई दिशा
पौध संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1994-95 में जैव और नीम आधारित कीटनाशकों का इस्तेमाल 123 मीट्रिक टन था। तीन दशक बाद 2024-25 में यह आंकड़ा 7,649 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड तक पहुंच गया।
आंकड़ों में यह बढ़ोतरी भले ही एक संख्या दिखाई देती हो, लेकिन किसान के नजरिए से इसका मतलब काफी बड़ा है। अब पौध संरक्षण में केवल तेज असर वाली रासायनिक दवाओं पर निर्भरता के बजाय रोकथाम, जैव नियंत्रण और एकीकृत प्रबंधन जैसी रणनीतियों की चर्चा खेत स्तर तक पहुंच रही है।
जैविक खेती का क्षेत्र भी लगातार फैल रहा है
जैविक खेती का दायरा भी पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है। राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम यानी NPOP के 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 39.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक सर्टिफिकेशन के दायरे में था। इसमें लगभग 22.5 लाख हेक्टेयर प्रमाणित जैविक क्षेत्र शामिल है, जबकि करीब 17.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक उत्पादन से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
इसी अवधि में करीब 46.99 लाख मीट्रिक टन जैविक उत्पादन दर्ज किया गया। भारत ने 3.68 लाख टन से अधिक जैविक उत्पादों का निर्यात भी किया और इससे करीब 5,394 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित हुई।
इससे यह संकेत मिलता है कि जैविक खेती केवल खेत की मिट्टी और पर्यावरण तक सीमित विषय नहीं है। अच्छी क्वालिटी वाले जैविक उत्पादों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार भी मौजूद है।

प्राकृतिक खेती को सरकार का सहारा, किसानों के लिए खुल रहा नया रास्ता
प्राकृतिक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी। इसके लिए 2,481 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में मिशन के तहत 18,893 किसान समूहों के माध्यम से करीब 10.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जोड़ा गया। इसमें लगभग 20.93 लाख किसान शामिल हुए।
प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों, पशुधन आधारित इनपुट और फसल विविधीकरण पर जोर दिया जाता है। इसका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य खेती की लागत कम करना और खेत में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है।
खेत में काम आ रहे हैं ट्राइकोडर्मा से लेकर नीम तक
अब सवाल आता है कि किसान आखिर कौन-कौन से जैविक विकल्प अपना सकते हैं?
ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी कवक बीज और मिट्टी से जुड़े कई रोगों के प्रबंधन में उपयोगी हो सकते हैं। बैसिलस और स्यूडोमोनास जैसे सूक्ष्मजीव पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय रहकर रोगजनक जीवों के खिलाफ मदद कर सकते हैं और पौधों के विकास में भी योगदान दे सकते हैं।
कीट प्रबंधन में ब्यूवेरिया बैसियाना और मेटाराइजियम जैसे जैविक एजेंटों का इस्तेमाल किया जाता है। नीम और अजादिरैक्टिन आधारित उत्पाद भी कई चूसक और पत्ती खाने वाले कीटों के प्रबंधन में उपयोगी हो सकते हैं। यानी किसान के पास विकल्पों की कमी नहीं है, जरूरत है सही फसल, सही कीट या रोग और सही परिस्थिति के अनुसार सही उत्पाद चुनने की।
बायो फर्टिलाइजर की मांग भी पकड़ रही है रफ्तार
सिर्फ कीट और रोग प्रबंधन ही नहीं, पोषण प्रबंधन में भी जैविक विकल्पों की भूमिका बढ़ रही है।
राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु और माइकोराइजा जैसे बायो फर्टिलाइजर किसानों के बीच उपयोग किए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना है। वहीं वर्मी कंपोस्ट, सामान्य कंपोस्ट और हरी खाद जैसे विकल्प मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इससे मिट्टी की संरचना और उसकी जैविक सक्रियता को बेहतर बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

जैविक उत्पाद खरीदते समय किसान न करें जल्दबाजी
यहां एक बात किसानों को विशेष रूप से समझनी होगी। बाजार में बिकने वाला हर जैविक उत्पाद एक जैसा प्रभावी नहीं होता। किसान भाइयों को खरीदारी के समय उत्पाद का रजिस्ट्रेशन विवरण, बैच नंबर, निर्माण तारीख, एक्सपायरी डेट, भंडारण निर्देश और लेबल पर दिए गए उपयोग संबंधी निर्देश जरूर देखने चाहिए।
खासकर जीवित सूक्ष्मजीवों वाले उत्पादों के मामले में भंडारण बहुत महत्वपूर्ण है। अत्यधिक गर्मी और तेज धूप में इन्हें रखने से उनकी प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।
जैविक दवा कोई जादू नहीं, सही समय और तरीका जरूरी
भारतीय किसान जैविक विकल्प और बायो-पेस्टिसाइड्स अपना रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर जैविक उत्पाद हर समस्या को तुरंत खत्म कर देगा।
जीवित सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों को काम करने के लिए उचित तापमान, नमी और समय की जरूरत हो सकती है। इसलिए इनका इस्तेमाल समस्या बहुत बढ़ जाने के बाद करने के बजाय रोकथाम और शुरुआती प्रबंधन की रणनीति में अधिक उपयोगी हो सकता है।
यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन यानी IPM को बेहतर रास्ता मानते हैं।
IPM मॉडल से बनेगा खेती का ज्यादा मजबूत सिस्टम
IPM में किसी एक तरीके पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कई उपायों को साथ लेकर चला जाता है। स्वस्थ बीज, रोगरोधी किस्में, फसल चक्र, खेत की स्वच्छता, संतुलित पोषण, जैविक नियंत्रण, निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर सीमित रासायनिक नियंत्रण इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यानी किसान का लक्ष्य यह होना चाहिए कि कीट या रोग को आर्थिक नुकसान की सीमा तक पहुंचने से पहले ही नियंत्रित कर लिया जाए।

आगे की खेती में सबसे बड़ा हथियार होगा ‘सही फैसला’
खेती का भविष्य शायद पूरी तरह रासायनिक या पूरी तरह जैविक किसी एक छोर पर नहीं है। ज्यादा व्यावहारिक रास्ता वैज्ञानिक संतुलन का है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक और सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को वैज्ञानिक तरीके से समेकित प्रबंधन में शामिल किया जाए तो खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है।
आने वाले समय में भारतीय किसानों के लिए जैविक विकल्प और बायोपेस्टिसाइड जैसी प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है, लेकिन इसका वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब किसान उत्पाद की गुणवत्ता, फसल की जरूरत और उपयोग की सही विधि को समझकर निर्णय लें।
आखिरकार अच्छी खेती का मतलब सिर्फ खेत में ज्यादा फसल खड़ी करना नहीं है। असली सफलता तब होगी जब उत्पादन के साथ मिट्टी की सेहत, किसान की आमदनी और पर्यावरण — तीनों का संतुलन बना रहे।
FAQ: किसानों के सवालों के सीधे जवाब: Organic Farming और Biopesticides
भारत में जैव-कीटनाशकों का उपयोग कितने गुना बढ़ा है?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1994-95 से 2024-25 के बीच जैव और नीम आधारित कीटनाशकों के उपयोग में करीब 62 गुना वृद्धि हुई है।
जैव-कीटनाशक क्या होते हैं?
जैव-कीटनाशक ऐसे पौध संरक्षण उत्पाद हैं जिनमें सूक्ष्मजीव, उनके उत्पाद या प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त सक्रिय घटक इस्तेमाल किए जाते हैं।
क्या जैविक कीटनाशक रासायनिक कीटनाशकों से बेहतर हैं?
हर स्थिति में ऐसा कहना सही नहीं होगा। फसल, कीट, रोग और खेत की परिस्थिति के अनुसार जैविक और रासायनिक दोनों विकल्पों की उपयोगिता अलग हो सकती है। IPM के तहत इनका वैज्ञानिक इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल किसलिए किया जाता है?
ट्राइकोडर्मा का उपयोग मुख्य रूप से मिट्टी और बीज से जुड़े कुछ रोगों के जैविक प्रबंधन में किया जाता है।
ब्यूवेरिया बैसियाना किस काम आता है?
ब्यूवेरिया बैसियाना एक जैविक फफूंद आधारित एजेंट है, जिसका इस्तेमाल कुछ हानिकारक कीटों के प्रबंधन में किया जाता है।
क्या जैविक उत्पाद खरीदते समय लेबल देखना जरूरी है?
हां। उत्पाद का रजिस्ट्रेशन, बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी तारीख, भंडारण तथा उपयोग संबंधी निर्देश देखना जरूरी है।
क्या जैविक खेती में रासायनिक दवाओं का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता?
प्रमाणित जैविक खेती के अपने निर्धारित मानक होते हैं। सामान्य टिकाऊ खेती में किसान जैविक विकल्पों के साथ आवश्यकता और नियमों के अनुसार दूसरे पौध संरक्षण उपाय भी अपना सकते हैं।
प्राकृतिक खेती का मुख्य उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों और जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग बढ़ाकर खेती की लागत कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।
जैविक उत्पादों को कैसे स्टोर करना चाहिए?
उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों के अनुसार भंडारण करना चाहिए। विशेष रूप से जीवित सूक्ष्मजीव वाले उत्पादों को अत्यधिक गर्मी और तेज धूप से बचाना महत्वपूर्ण है।
क्या जैव-कीटनाशक हर कीट को खत्म कर देते हैं?
नहीं। हर जैविक उत्पाद किसी खास कीट, रोग या परिस्थिति के लिए उपयोगी हो सकता है। इसलिए समस्या की सही पहचान के बाद ही उपयुक्त उत्पाद का चयन करना चाहिए।
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