मटर की फसल को बचाएं: मटर के रोग (Peas Diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम – सम्पूर्ण जानकारी

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किसान भाइयों, मटर की खेती कम समय में अच्छा मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है। रबी के मौसम में, यह न केवल हमें सब्जी और दाल प्रदान करती है, बल्कि खेत की मिट्टी को भी उपजाऊ बनाती है। लेकिन अगर समय रहते मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम पर ध्यान न दिया जाए, तो यही फसल भारी नुकसान का कारण बन सकती है। यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि आपकी मेहनत का भी नुकसान है। इसलिए आज का यह लेख पूरी तरह से मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम पर केंद्रित है।

इस लेख में हम मटर के प्रमुख रोग (Major Peas diseases), उनके लक्षण, हानिकारक कीट, रासायनिक और ऑर्गेनिक रोकथाम को आसान भाषा में समझेंगे ताकि आप सीधे इसे अपने खेत में लागू कर सकें।

मटर की फसल का महत्व (Importance of Peas Crop)

इससे पहले कि हम मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के बारे में गहराई से जानें, हर किसान को ये जानना चाहिए कि मटर की खेती (Peas Farming) किसान के लिए क्यों महत्वपूर्ण (Importance of Peas Farming) है। इसकी खेती का आर्थिक फायदा क्या है और मिट्टी पर इस फसल क्या प्रभाव पड़ेगा।

महत्वविवरण
पोषणमटर में प्रोटीन, विटामिन और फाइबर भरपूर मात्रा में होता है।
आर्थिक लाभकम समय में तैयार होने वाली नकदी फसल (Cash Crop) है, जिससे जल्दी आमदनी होती है।
मिट्टी सुधारमटर की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु होते हैं जो वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। दलहनी फसल होने से नाइट्रोजन बढ़ाती है
कम लागतकम खाद और पानी में अच्छी उपज
बाजार मांगहरी मटर और सूखी मटर दोनों की मांग
पशु आहारमटर का भूसा पशुओं के लिए एक उत्तम और पौष्टिक चारा है।
फसल चक्रयह फसल चक्र (Crop Rotation) के लिए सबसे बेहतरीन फसल मानी जाती है। गेहूँ–धान चक्र में सुधार

मटर की खेती में रोग और कीट क्यों बढ़ते हैं? (Reasons for Peas Diseases & Pests)

मटर के रोग (Peas diseases) और कीट प्रकोप का मुख्य कारण बीज की खराब गुणवत्ता, लगातार एक ही फसल लेना, अधिक नमी, गलत सिंचाई और संतुलित खाद का अभाव है। ठंडे मौसम में फफूंद (fungus) तेजी से फैलती है, जिससे मटर के रोग गंभीर रूप ले लेते हैं। इसलिए रोकथाम सबसे जरूरी है।

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1. मटर का उकठा रोग (Wilt Disease in Peas)

मटर के रोग (Peas diseases): मटर की खेती में सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाने वाला अगर कोई रोग है, तो वह है उकठा रोग। जब हम मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम की बात करते हैं, तो उकठा रोग सबसे पहले आता है। यह एक मृदा जनित (मिट्टी से फैलने वाला) रोग है जो फफूंद (Fusarium) के कारण होता है।

लक्षण: इस रोग में पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा पौधा सूख जाता है। अगर आप पौधे को उखाड़कर देखेंगे, तो उसकी जड़ें काली या भूरी दिखाई देंगी। यह रोग फसल की किसी भी अवस्था में लग सकता है, लेकिन फूल आने के समय इसका प्रकोप ज्यादा दिखता है। खेत में जगह-जगह पौधे सूखे हुए दिखाई देते हैं।

रोकथाम: इस रोग से बचने के लिए सबसे जरूरी है बीज उपचार। बुवाई से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा विरिडी (Trichoderma Viride) 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। फसल चक्र अपनाएं और जिस खेत में पहले उकठा लगा हो, वहां 3-4 साल तक मटर न लगाएं। गर्मी में गहरी जुताई जरूर करें।

लक्षण

  • पौधे हरे रहते हुए भी मुरझा जाते हैं
  • जड़ें सड़ने लगती हैं
  • पौधा जमीन से आसानी से उखड़ जाता है

रोकथाम

  • रोगमुक्त बीज का प्रयोग
  • बीज उपचार: ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम/किलो
  • फसल चक्र अपनाएं
  • खेत में जलभराव न होने दें

2. मटर का चूर्णिल आसिता रोग (Powdery Mildew)

मटर के रोग (Peas diseases): सर्दियों के अंत में या जब मौसम में बादलो वाला माहौल होता है, तब चूर्णिल आसिता यानी पाउडरी मिलड्यू का प्रकोप बढ़ जाता है। मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम को समझते समय इस रोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह रोग ‘एरीसाइफी पॉलीगोनी’ नामक फफूंद से फैलता है।

लक्षण: जैसा कि नाम से पता चलता है, इस रोग में पौधों की पत्तियों, तनों और फलियों पर सफेद रंग का पाउडर जैसा पदार्थ जम जाता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने पौधे पर आटा छिड़क दिया हो। इसके कारण पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते, पत्तियां पीली पड़कर गिर जाती हैं और फलियों में दाने बहुत छोटे रह जाते हैं या बनते ही नहीं हैं।

रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक (Wettable Sulphur) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। अगर रोग ज्यादा बढ़ गया हो, तो कैराथेन (Karathane) 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कें। 10-12 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। यह मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम का एक कारगर उपाय है।

लक्षण

  • पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत
  • पत्तियां पीली होकर सूखना
  • फलन पर असर

रोकथाम

  • सल्फर 2 ग्राम/लीटर छिड़काव
  • नीम तेल 3 ml/लीटर (ऑर्गेनिक)
  • संतुलित सिंचाई

3. मटर का रतुआ रोग (Rust Disease)

मटर के रोग (Peas diseases): रतुआ या रस्ट रोग अक्सर तब आता है जब फसल पकने वाली होती है, लेकिन अगर यह जल्दी आ जाए तो भारी नुकसान करता है। मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम की सूची में यह एक प्रमुख फफूंद जनित रोग है। यह नमी और गर्म मौसम में तेजी से फैलता है।

लक्षण: इस रोग की शुरुआत में पत्तियों और तनों पर पीले या भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे गहरे भूरे या काले रंग के हो जाते हैं। हाथ लगाने पर उंगलियों पर जंग जैसा पाउडर लग जाता है। इससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उपज की गुणवत्ता खराब हो जाती है।

रोकथाम: रतुआ रोग से बचने के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें। लक्षण दिखते ही मैंकोजेब (Mancozeb 75 WP) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। खेत में हवा का आवागमन सही रखें, यानी पौधों की बुवाई बहुत घनी न करें। सही समय पर मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के उपाय अपनाने से फसल बच सकती है।

लक्षण

  • पत्तियों के नीचे भूरे-नारंगी रंग के छोटे धब्बे दिखाई देना
  • धब्बों से भूरा पाउडर निकलना
  • पत्तियाँ पीली होकर समय से पहले झड़ना
  • पौधे की बढ़वार रुक जाना
  • अधिक प्रकोप में फलन कम होना

रोकथाम

  • रोगग्रस्त पत्तियों को तोड़कर नष्ट करें
  • सल्फर 2 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव
  • मैंकोजेब 2.5 ग्राम/लीटर का छिड़काव (जरूरत पर)
  • खेत में हवा का अच्छा संचार रखें
  • संतुलित सिंचाई करें, अधिक नमी से बचें

मटर के कीट (Peas Pests )

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मटर की खेती में कीट का विशेष रूप से ध्यान देना पड़ता है। नहीं तो फसल पे भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

1. मटर का फली छेदक कीट (Pod Borer)

रोगों के अलावा कीड़े भी फसल के बड़े दुश्मन हैं। फली छेदक (Pod Borer) मटर का सबसे खतरनाक शत्रु कीट है। जब हम मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम पर चर्चा करते हैं, तो इस कीट का जिक्र होना बहुत जरूरी है। यह सीधे आपकी पैदावार यानी मटर के दानों को खाता है।

लक्षण: इसकी सुंडी (इल्ली) हरे या भूरे रंग की होती है। यह पहले कोमल पत्तियों को खाती है और फिर फलियों में छेद करके अंदर घुस जाती है और दानों को खा जाती है। इससे मटर की बाजार में कीमत (Market Value) खत्म हो जाती है।

रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए खेत में पक्षियों के बैठने के लिए ‘टी’ (T) आकार की लकड़ियां लगाएं, ताकि पक्षी इल्लियों को खा सकें। रासायनिक नियंत्रण के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट (Emamectin Benzoate) 5 एस.जी. का 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। फेरोमोन ट्रैप (Pheromone Trap) लगाना भी एक बेहतरीन उपाय है।

लक्षण

  • फलियों पर छोटे-छोटे छेद दिखाई देना
  • फली के अंदर के दाने कटे-फटे या खाए हुए मिलना
  • हरी इल्ली का फली के पास दिखाई देना
  • फलियों का समय से पहले सूखना
  • उपज में सीधी और भारी कमी

रोकथाम

  • फेरोमोन ट्रैप खेत में लगाएं
  • नीम तेल 3 ml/लीटर पानी का छिड़काव करें
  • नीम बीज अर्क 5% का प्रयोग
  • स्पिनोसैड या इमामेक्टिन बेंजोएट का छिड़काव (जरूरत पर)
  • संक्रमित फलियों को तोड़कर नष्ट करें

2. तना मक्खी (Stem Fly) का प्रकोप और नियंत्रण

तना मक्खी मटर की फसल को शुरुआती अवस्था में ही नुकसान पहुँचाती है। कई बार किसान भाई इसे उकठा रोग समझ लेते हैं, लेकिन यह अलग है। मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम में तना मक्खी की पहचान करना बहुत जरूरी है।

लक्षण: यह मक्खी पत्तियों पर अंडे देती है, जिससे निकलने वाली इल्ली तने के अंदर घुसकर उसे खोखला कर देती है। तना जमीन के पास से फूल जाता है और फट जाता है। पौधा पीला पड़कर सूखने लगता है। इसका हमला बुवाई के 15-20 दिन बाद ही शुरू हो सकता है।

रोकथाम: बुवाई के समय फोरेट 10 जी (Phorate 10G) 10 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाएं। खड़ी फसल में डायमेथोएट (Dimethoate 30 EC) 1.7 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। समय से बुवाई करने पर (अक्टूबर अंत तक) इसका प्रकोप कम होता है। मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के लिए बुवाई का समय भी बहुत मायने रखता है।

लक्षण

  • पौधे की ऊपरी पत्तियाँ पीली और मुरझाई हुई दिखाई देती हैं
  • पौधे की बढ़वार रुक जाती है
  • तना अंदर से खोखला हो जाता है
  • प्रभावित पौधा आसानी से टूट जाता है
  • अधिक प्रकोप में पौधा पूरी तरह सूख जाता है
  • तने को चीरने पर सफेद रंग की सुंडी दिखाई देती है

रोकथाम

  • बीज उपचार करें (इमिडाक्लोप्रिड 70 WS @ 5 ग्राम/किलो बीज)
  • नीम तेल 3 ml/लीटर पानी का छिड़काव
  • नीम खली खेत में मिलाएं
  • थायमेथोक्साम या एसिटामिप्रिड का छिड़काव (जरूरत पर)
  • खेत को खरपतवार मुक्त रखें

3.लीफ माइनर कीट (Leaf Miner)

आपने देखा होगा कि मटर की पत्तियों पर सफेद रंग की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बन जाती हैं। यह लीफ माइनर कीट का काम है। मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के अंतर्गत इसे समझना जरूरी है क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को बाधित करता है।

लक्षण: इस कीट की लटें (Larva) पत्तियों की दोनों परतों के बीच रहकर हरे भाग को खाती हैं, जिससे पत्तियों पर सफेद सुरंगें बन जाती हैं। ज्यादा प्रकोप होने पर पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं, जिससे पौधे का विकास रुक जाता है।

रोकथाम: नीम के तेल (Neem Oil) का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। यदि प्रकोप अधिक हो तो इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) 17.8 SL का 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग करें। प्रभावित पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देना भी मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम का एक अच्छा तरीका है।

लक्षण

  • पत्तियों पर सफेद या हल्की भूरी टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें दिखाई देती हैं
  • पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगती हैं
  • पत्तियों का हरा भाग नष्ट हो जाता है
  • पौधे की बढ़वार रुक जाती है
  • अधिक प्रकोप में पौधा कमजोर और बौना रह जाता है

रोकथाम

  • पीले चिपचिपे ट्रैप खेत में लगाएं
  • नीम तेल 3 ml/लीटर पानी का छिड़काव करें
  • नीम आधारित कीटनाशक का प्रयोग
  • स्पिनोसैड या एबामेक्टिन का छिड़काव (जरूरत पड़ने पर)
  • प्रभावित पत्तियों को तोड़कर नष्ट करें

4. माहूँ या एफिड (Aphids) का नियंत्रण

माहूँ (Mahu), जिसे चेपा भी कहते हैं, छोटे हरे या काले रंग के कीड़े होते हैं जो झुंड में रहते हैं। ये न केवल रस चूसते हैं बल्कि मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के संदर्भ में वायरस फैलाने का काम भी करते हैं।

लक्षण: ये कीड़े कोमल तनों, पत्तियों और फलियों का रस चूसते हैं। इससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और पत्तियां मुड़ जाती हैं। ये एक चिपचिपा पदार्थ (Honeydew) छोड़ते हैं जिस पर काली फफूंद जम जाती है।

रोकथाम: खेत में पीले चिपचिपे प्रपंच (Yellow Sticky Traps) लगाएं। शुरुआत में नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग करें। ज्यादा हमले की स्थिति में थायोमेथोक्जाम (Thiamethoxam 25 WG) 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। सही समय पर कीटनाशक का प्रयोग मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम सुनिश्चित करता है।

लक्षण

  • पत्तियां चिपचिपी
  • काली फफूंद
  • पौधे की बढ़वार रुकना

रोकथाम

  • पीले चिपचिपे ट्रैप
  • नीम तेल 3 ml/लीटर
  • इमिडाक्लोप्रिड (जरूरत पर)

मटर के रोगों के लिए ऑर्गेनिक (जैविक) रोकथाम

आजकल बाजार में रसायन मुक्त सब्जियों की मांग बढ़ रही है। इसलिए मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम में ऑर्गेनिक तरीकों का अपना अलग महत्व है। इससे खेती की लागत भी कम होती है और जमीन भी सुरक्षित रहती है।

  1. बीजामृत और जीवामृत: बुवाई से पहले बीजों को बीजामृत से उपचारित करें। खड़ी फसल में जीवामृत का छिड़काव करने से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  2. नीम का तेल: 1500-3000 पीपीएम का नीम तेल 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर हर 15 दिन में छिड़कें। यह सभी रस चूसने वाले कीटों और इल्लियों को दूर रखता है।
  3. ट्राइकोडर्मा (Trichoderma): यह एक मित्र फफूंद है। इसे गोबर की खाद में मिलाकर खेत में डालने से उकठा और जड़ सड़न जैसे रोग नहीं आते।
  4. दशपर्णी अर्क: 10 प्रकार की पत्तियों से बना यह अर्क कीड़ों के लिए काल है। इसका प्रयोग मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के लिए बहुत प्रभावी है।
  5. बर्ड परचर (Bird Percher): पक्षियों के बैठने के लिए खेत में बांस की खपच्चियां लगाएं, पक्षी प्राकृतिक रूप से इल्लियों को खा जाएंगे।

सरकारी योजनाएँ और किसान क्रेडिट कार्ड (Government Schemes and KCC)

मटर के रोग (Peas diseases): खेती में मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए किसान सरकारी योजनाओं का भी लाभ उठा सकते हैं। ये योजनाएँ खेती की लागत को कम करने और पूंजी (Capital) की व्यवस्था करने में मदद करती हैं।

मटर के रोग (Peas diseases): भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली कई योजनाएँ हैं, जो किसानों को सब्ज़ी और बागवानी (Horticulture) फसलों के लिए सब्सिडी (Subsidy) देती हैं।

  1. राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM): इस योजना के तहत, आलू की खेती के लिए उन्नत बीज, प्लांटर मशीन, कोल्ड स्टोरेज बनाने और माइक्रो-इरिगेशन सिस्टम लगाने पर सब्सिडी मिल सकती है।
  2. प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): यह योजना सीधे किसानों के खाते में सालाना ₹6,000 की वित्तीय सहायता देती है, जिसका उपयोग किसान खेती के छोटे-मोटे ख़र्चों के लिए कर सकते हैं।

सबसे ज़रूरी है किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card – KCC)। केसीसी के ज़रिए किसान बहुत कम ब्याज दर पर (लगभग 4% प्रति वर्ष) खेती के लिए लोन (Loan) ले सकते हैं। इस पैसे का उपयोग आलू के बीज, खाद, कीटनाशक खरीदने या बुवाई के ख़र्चों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। इससे किसान को तुरंत पैसा उधार लेने या अपनी बचत को ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। किसान को हमेशा अपने क्षेत्र के कृषि विभाग या बागवानी विभाग से संपर्क करके नवीनतम योजनाओं और सब्सिडी के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)

किसान भाइयों, मटर की फसल से अच्छा उत्पादन लेने के लिए जागरूकता सबसे ज्यादा जरूरी है। हमने इस लेख में विस्तार से मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम के बारे में चर्चा की है। चाहे उकठा रोग हो या फली छेदक कीट, सही समय पर पहचान और उचित कार्यवाही ही आपकी फसल को बचा सकती है।

हमेशा याद रखें, “इलाज से बेहतर बचाव है”। इसलिए बीज उपचार और फसल चक्र जैसे तरीकों को जरूर अपनाएं। रसायनों का प्रयोग आखिरी विकल्प के रूप में ही करें और ऑर्गेनिक खेती की तरफ अपने कदम बढ़ाएं। हमें उम्मीद है कि मटर के रोग (Peas Diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम पर दी गई यह जानकारी आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगी और आप इस रबी सीजन में बंपर पैदावार लेंगे।

FAQ: मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मटर में उकठा रोग (Wilt) की सबसे अच्छी दवा कौन सी है?

मटर के उकठा रोग के लिए सबसे अच्छा उपाय बीज उपचार है। ट्राइकोडर्मा विरिडी या कार्बेन्डाजिम (Bavistin) 2 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें। खड़ी फसल में लक्षण दिखने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का ड्रेन्चिंग (जड़ों में डालना) प्रभावी होता है। यह मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम का अहम हिस्सा है।

मटर की फसल में फली छेदक (इल्ली) को कैसे खत्म करें?

फली छेदक को खत्म करने के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट (Emamectin Benzoate) या कोराजन (Coragen) का छिड़काव करें। जैविक तरीके में नीम का तेल और फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करें।

मटर की पत्तियों पर सफेद पाउडर क्यों जम जाता है?

यह पाउडरी मिलड्यू (Powdery Mildew) रोग है। इसे ठीक करने के लिए घुलनशील गंधक (Sulphur) या कैराथेन का छिड़काव करें। यह मटर का एक प्रमुख रोग है।

क्या मटर की खेती पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से की जा सकती है?

जी हाँ, बिल्कुल। ट्राइकोडर्मा, नीम तेल, पंचगव्य और जीवामृत का सही उपयोग करके आप रसायनों के बिना भी मटर की अच्छी खेती कर सकते हैं और मटर के रोग (Peas diseases), लक्षण, कीट और उनकी रोकथाम कर सकते हैं।

मटर की फसल में पहला छिड़काव कब करना चाहिए?

आमतौर पर पहला छिड़काव बुवाई के 20-25 दिन बाद या कीट/रोग के लक्षण दिखते ही करना चाहिए। एहतियात के तौर पर नीम तेल का छिड़काव शुरुआती अवस्था में करना फायदेमंद होता है।

मटर के रोग (Peas diseases) से सबसे ज्यादा नुकसान कौन-सा करता है?

उकठा रोग और फली छेदक कीट।

मटर के रोग का ऑर्गेनिक इलाज क्या है?

ट्राइकोडर्मा, नीम तेल, गोमूत्र अर्क।

मटर में कीट नियंत्रण का सबसे सस्ता तरीका?

फेरोमोन ट्रैप और नीम आधारित स्प्रे।

मटर की फसल में दवा कब छिड़कें?

रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखते ही।

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