मूंग में तेजी से फैल रहा पीला मोजेक, समय रहते नहीं संभले तो फसल हो सकती है बर्बाद।

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मूंग, मोठ, उड़द और चंवला की फसल पर पीला मोजेक का खतरा बढ़ा, किसानों को तुरंत सतर्क रहने की सलाह।

खरीफ सीजन में दलहनी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए बड़ी चेतावनी सामने आई है। मूंग, मोठ, उड़द और चंवला जैसी फसलों में पीला मोजेक वायरस (YMV) तेजी से फैलने लगा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते रोकथाम नहीं की गई, तो इससे पैदावार पर गहरा असर पड़ सकता है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि से जुड़ी ऐसी ही नई जानकारी के लिए किसान भाइयों Bihar Agro को विजिट करें।

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क्या है पीला मोजेक रोग (Yellow Mosaic Disease)?

ग्राह्य परीक्षण केंद्र, अजमेर के उप निदेशक कृषि (शस्य) मनोज कुमार शर्मा के अनुसार, पीला मोजेक (Yellow Mosaic) एक वायरस जनित रोग है। यह बीमारी सीधे पौधों से नहीं, बल्कि सफेद मक्खी जैसे रस चूसने वाले कीटों के जरिए एक खेत से दूसरे खेत तक फैलती है। यही वजह है कि इसके नियंत्रण में सिर्फ रोगग्रस्त पौधों को हटाना ही काफी नहीं होता, बल्कि सफेद मक्खी पर भी कड़ा नियंत्रण जरूरी है।

कैसे फैलता है यह पीला मोजेक रोग?

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, सफेद मक्खी (Whitefly) जब किसी संक्रमित पौधे पर बैठकर रस चूसती है, तो वायरस उसके शरीर में आ जाता है। इसके बाद यही कीट दूसरे स्वस्थ पौधे पर जाकर उसे भी संक्रमित कर देती है। कुछ ही समय में पूरा खेत इसकी चपेट में आ सकता है। इसी कारण शुरुआती स्तर पर ही सतर्कता बेहद जरूरी मानी जाती है।

पीला मोजेक रोग के लक्षण कैसे पहचानें?

सहायक कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट) डॉ. सुरेश चौधरी ने बताया कि इस रोग की पहचान कुछ साफ लक्षणों से की जा सकती है। पत्तियों पर पीले और हरे रंग के चितकबरे धब्बे दिखने लगते हैं। कई बार पत्तियां सिकुड़ जाती हैं और उनका आकार भी बिगड़ जाता है। संक्रमित पौधों में फलियां कम लगती हैं और जो फलियां बनती हैं, वे भी ठीक से विकसित नहीं हो पातीं। अगर रोग शुरुआत में ही लग जाए, तो पौधे की बढ़वार रुक सकती है।

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किसानों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेत में निगरानी सबसे पहला कदम है। जैसे ही किसी पौधे में लक्षण दिखें, उसे तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट कर देना चाहिए। इसके साथ ही सफेद मक्खी की लगातार जांच करते रहना जरूरी है। खेत में कीटों की संख्या बढ़ते ही अनुशंसित दवाओं का छिड़काव करना चाहिए, ताकि वायरस फैलने से पहले ही कीटों पर रोक लग सके।

सफेद मक्खी पर नियंत्रण के लिए कौन-सी दवाएं उपयोगी हैं?

कृषि विभाग के अनुसार, रोग फैलाने वाली सफेद मक्खी को रोकने के लिए प्रति हेक्टेयर नीचे दी गई दवाओं में से किसी एक का छिड़काव किया जा सकता है:

  • इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL – 150 मिलीलीटर
  • फ्लोनीकामिड 50% WG – 200 ग्राम
  • डायमिथोएट 30 EC – 1 लीटर

कृषि विशेषज्ञों ने यह भी सलाह दी है कि पहला छिड़काव करने के बाद लगभग 15 दिन के अंतर पर दूसरा छिड़काव जरूर किया जाए, ताकि कीटों पर बेहतर नियंत्रण मिल सके।

छिड़काव करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

दवा का छिड़काव करते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। किसानों को दस्ताने, मास्क और पूरे सुरक्षा वस्त्र पहनकर ही छिड़काव करना चाहिए। दवा का प्रयोग सिर्फ साफ और शांत मौसम में करें। मात्रा कभी भी जरूरत से ज्यादा न रखें। साथ ही बच्चों और पशुओं को छिड़काव वाले खेत से दूर रखना चाहिए।

समय रहते कदम उठाने से बच सकती है फसल

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसान शुरुआती दौर में ही पीला मोजेक रोग की पहचान कर लें और सफेद मक्खी पर तुरंत नियंत्रण कर दें, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों की सफाई और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार दवा का सही उपयोग ही इस रोग से बचाव का सबसे असरदार तरीका है।

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FAQ-अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पीला मोजेक रोग क्या है?

पीला मोजेक एक वायरस जनित रोग है, जो मूंग, मोठ, उड़द और चंवला जैसी दलहनी फसलों को प्रभावित करता है।

यह रोग किन फसलों में ज्यादा देखा जाता है?

यह रोग मुख्य रूप से मूंग, मोठ, उड़द और चंवला की फसल में फैलता है।

पीला मोजेक रोग कैसे फैलता है?

यह रोग सफेद मक्खी के जरिए एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलता है।

इस रोग के प्रमुख लक्षण क्या हैं?

पत्तियों पर पीले-हरे चितकबरे धब्बे, पत्तियों का सिकुड़ना, फलियों की संख्या कम होना और पौधों की बढ़वार रुक जाना इसके प्रमुख लक्षण हैं।

सफेद मक्खी पर नियंत्रण क्यों जरूरी है?

क्योंकि यही कीट पीला मोजेक वायरस को फैलाने का मुख्य माध्यम है। सफेद मक्खी पर नियंत्रण नहीं किया गया तो रोग तेजी से पूरे खेत में फैल सकता है।

संक्रमित पौधों के साथ क्या करना चाहिए?

संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

सफेद मक्खी के लिए कौन-सी दवाएं उपयोगी हैं?

इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL, फ्लोनीकामिड 50% WG और डायमिथोएट 30 EC में से किसी एक का प्रति हेक्टेयर अनुशंसित मात्रा में छिड़काव किया जा सकता है।

क्या एक बार छिड़काव काफी है?

नहीं, बेहतर नियंत्रण के लिए 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करना जरूरी है।

छिड़काव करते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए?

दस्ताने, मास्क और सुरक्षा वस्त्र पहनें, शांत मौसम में छिड़काव करें, तय मात्रा से ज्यादा दवा न डालें और बच्चों व पशुओं को दूर रखें।

क्या समय पर नियंत्रण से फसल बचाई जा सकती है?

हाँ, शुरुआती पहचान, संक्रमित पौधों की सफाई और सफेद मक्खी पर समय पर नियंत्रण से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।

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