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किसान भाइयों, अरहर (तुअर) की फसल कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने के लिए जानी जाती है, लेकिन अगर अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) सही समय और सही मात्रा में की जाए, तो उत्पादन और मुनाफा दोनों साधारण पैदावार के मुकाबले 40% तक बढ़ सकती है। बहुत से किसान या तो ज़रूरत से ज़्यादा पानी दे देते हैं या कम देते हैं, जिससे फसल पर बुरा असर पड़ता है। इस लेख में हम आपको अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) से जुड़ी पूरी जानकारी सरल और आम बोलचाल की भाषा में देंगे, ताकि आप सीधे इसे अपने खेत में लागू कर सकें।
अरहर की सिंचाई का महत्व (Importance of Pigeon Pea Irrigation)
अरहर एक ऐसी फसल है जिसकी जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, इसलिए यह सूखा सहने की क्षमता रखती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसे पानी की जरूरत नहीं है। पौधे के विकास के शुरुआती दिनों में और फिर जब उसमें फूल आने लगते हैं, तब नमी की कमी फसल को भारी नुकसान पहुँचा सकती है। अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) सही समय पर करने से पौधों का विकास तेजी से होता है, शाखाएं अधिक निकलती हैं और फलियों में दानों का भराव अच्छा होता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जरूरत के समय दी गई एक सिंचाई भी उपज में भारी अंतर पैदा कर देती है।
अरहर की सिंचाई के मुख्य चरण (Critical Stages of Pigeon Pea Irrigation)
1. अरहर की पहली सिंचाई (First Irrigation in Pigeon Pea)
अरहर की सिंचाई आमतौर पर बोआई के बाद पहली बार तभी करनी चाहिए जब मिट्टी में नमी की कमी दिखे। अगर बारिश से पर्याप्त नमी है तो पहली सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। सामान्यतः बोआई के 20–25 दिन बाद हल्की सिंचाई लाभदायक होती है, खासकर तब जब खेत सूखा हो। पहली सिंचाई पौधों की शुरुआती बढ़वार के लिए बहुत जरूरी होती है। ध्यान रखें कि पानी खेत में जमा न हो, क्योंकि इससे अंकुर और जड़ें खराब हो सकती हैं। सही समय की पहली Pigeon Pea Irrigation मजबूत पौधे तैयार करती है।
2. फूल आने के समय सिंचाई (Irrigation at Flowering Stage)
अरहर की फसल में फूल आने का समय सबसे संवेदनशील माना जाता है। इस समय अरहर की सिंचाई अगर सही ढंग से की जाए तो पैदावार में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। फूल बनने के दौरान पानी की कमी होने पर फूल झड़ने लगते हैं, जिससे फलियां कम बनती हैं। इसलिए इस अवस्था में हल्की लेकिन समय पर Pigeon Pea Irrigation जरूरी है। ध्यान रखें कि ज्यादा पानी न दें, वरना फूल गिर सकते हैं। मिट्टी में बस इतनी नमी हो कि पौधा तनाव (Stress) में न आए।
3. फलियां बनने पर सिंचाई (Irrigation at Pod Formation Stage)
फलियां बनने और दाना भरने के समय अरहर की सिंचाई का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। इस स्टेज पर पानी की कमी से दाने सिकुड़ जाते हैं और वजन कम हो जाता है। एक हल्की सिंचाई इस समय बहुत फायदेमंद होती है। अगर इस समय खेत सूखा रह गया तो पूरी मेहनत बेकार हो सकती है। इसलिए Pigeon Pea Irrigation इस अवस्था में जरूर करें, लेकिन जलभराव से बचें। अच्छी सिंचाई से दाने चमकदार और भारी बनते हैं।
अरहर में कितनी सिंचाई जरूरी है? (How Many Irrigations Are Needed)

आमतौर पर अरहर की फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। सामान्य परिस्थितियों में 2 से 3 अरहर की सिंचाई पर्याप्त होती हैं। अगर बारिश ठीक से हो जाए तो कई बार सिंचाई की जरूरत ही नहीं पड़ती। सूखे क्षेत्रों में 3 से 4 बार Pigeon Pea Irrigation करनी पड़ सकती है। सबसे जरूरी बात यह है कि सिंचाई मौसम, मिट्टी और किस्म के अनुसार तय की जाए। हल्की और सीमित सिंचाई हमेशा ज्यादा फायदेमंद रहती है।
जलभराव से बचाव और निकास (Drainage and Waterlogging Issues)
जहाँ एक तरफ पानी जरूरी है, वहीं जरूरत से ज्यादा पानी अरहर का सबसे बड़ा दुश्मन है। अरहर के खेत में अगर 24 घंटे से ज्यादा पानी रुक जाए, तो पौधों में ‘उकठा’ (Wilt) रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं। अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) करते समय ध्यान रखें कि पानी उतना ही दें जितना जमीन सोख सके। बरसात के मौसम में खेत में जल निकासी (Drainage) का उचित प्रबंध होना चाहिए। ऊँची मेड़ों पर अरहर की बुवाई करना जलभराव से बचने का सबसे बेहतरीन और आधुनिक तरीका माना जाता है।
सिंचाई की आधुनिक विधियाँ (Modern Irrigation Methods)
आज के दौर में पानी की बचत और फसल की सेहत के लिए ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर (Sprinkler) तकनीक सबसे कारगर है। अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) के लिए यदि आप ड्रिप सिस्टम अपनाते हैं, तो पानी सीधे जड़ों तक पहुँचता है, जिससे खाद का असर भी बेहतर होता है और खरपतवार कम उगते हैं। स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करने पर खेत का तापमान बना रहता है और पौधों को एक समान नमी मिलती है। इन तकनीकों को अपनाने से न केवल 50% तक पानी की बचत होती है, बल्कि मेहनत और मजदूरी का खर्च भी कम हो जाता है।
मिट्टी के अनुसार सिंचाई प्रबंधन (Soil-Based Irrigation Management)
आपकी जमीन कैसी है, इस पर भी अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) निर्भर करती है। अगर आपकी मिट्टी रेतीली या हल्की है, तो आपको कम अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए क्योंकि ऐसी मिट्टी पानी जल्दी सोख लेती है। वहीं, अगर मिट्टी भारी या काली मिट्टी है, तो वह ज्यादा देर तक नमी रोक कर रख सकती है, इसलिए वहां सिंचाई का अंतराल बढ़ाया जा सकता है। हमेशा याद रखें कि सिंचाई शाम के समय या सुबह जल्दी करना सबसे अच्छा होता है, ताकि धूप के कारण पानी का वाष्पीकरण (Evaporation) कम से कम हो और पौधों को पूरी नमी मिले।
अरहर की सिंचाई में सावधानियां (Precautions in Pigeon Pea Irrigation)

अरहर की सिंचाई करते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए। खेत में पानी जमा न होने दें, क्योंकि इससे जड़ सड़न और विल्ट रोग फैल सकता है। बहुत ठंडे या बहुत गर्म समय में सिंचाई न करें। नालियों से सिंचाई (Furrow Irrigation) सबसे अच्छी मानी जाती है। हल्की लेकिन नियंत्रित Pigeon Pea Irrigation फसल को स्वस्थ रखती है। सही सावधानियों से आप नुकसान से बच सकते हैं और बेहतर उत्पादन पा सकते हैं।
सरकारी योजनाएँ और किसान क्रेडिट कार्ड (Government Schemes and KCC)
खेती में मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए किसान सरकारी योजनाओं का भी लाभ उठा सकते हैं। ये योजनाएँ खेती की लागत को कम करने और पूंजी (Capital) की व्यवस्था करने में मदद करती हैं।
भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली कई योजनाएँ हैं, जो किसानों को सब्ज़ी और बागवानी (Horticulture) फसलों के लिए सब्सिडी (Subsidy) देती हैं।
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM): इस योजना के तहत, आलू की खेती के लिए उन्नत बीज, प्लांटर मशीन, कोल्ड स्टोरेज बनाने और माइक्रो-इरिगेशन सिस्टम लगाने पर सब्सिडी मिल सकती है।
- प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): यह योजना सीधे किसानों के खाते में सालाना ₹6,000 की वित्तीय सहायता देती है, जिसका उपयोग किसान खेती के छोटे-मोटे ख़र्चों के लिए कर सकते हैं।
सबसे ज़रूरी है किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card – KCC)। केसीसी के ज़रिए किसान बहुत कम ब्याज दर पर (लगभग 4% प्रति वर्ष) खेती के लिए लोन (Loan) ले सकते हैं। इस पैसे का उपयोग आलू के बीज, खाद, कीटनाशक खरीदने या बुवाई के ख़र्चों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। इससे किसान को तुरंत पैसा उधार लेने या अपनी बचत को ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। किसान को हमेशा अपने क्षेत्र के कृषि विभाग या बागवानी विभाग से संपर्क करके नवीनतम योजनाओं और सब्सिडी के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए।
- सीड ड्रिल और पैडी ड्रिल मशीन पर सब्सिडी उपलब्ध
- कृषि विभाग द्वारा प्रशिक्षण और डेमो प्लॉट
- ऑनलाइन जानकारी: भारत सरकार कृषि पोर्टल
- प्रेस इनफार्मेशन सरकारी रिलीज
- बीज आवेदन के लिए यहाँ क्लिक करें।
किसान भाइयों, उम्मीद है कि अरहर की सिंचाई (Pigeon Pea Irrigation) पर दी गई यह जानकारी आपके काम आएगी। अपनी फसल का ख्याल रखें और सही समय पर पानी देकर बंपर मुनाफा कमाएं।
FAQ: अरहर की सिंचाई कैसे करें? (Pigeon Pea Irrigation Guide) पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल।
अरहर में पहली सिंचाई कब करनी चाहिए?
आमतौर पर खरीफ की अरहर को सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन यदि बारिश न हो, तो बुवाई के 30-45 दिनों बाद पहली सिंचाई की जा सकती है।
क्या ज्यादा पानी देने से अरहर सूख जाती है?
जी हाँ, अरहर में जलभराव के कारण जड़ सड़न और उकठा रोग हो जाता है, जिससे पूरी फसल सूख सकती है।
फूल आते समय सिंचाई करना क्यों जरूरी है?
फूल आते समय नमी की कमी से फूल झड़ने लगते हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आती है।
सिंचाई के लिए सबसे अच्छी तकनीक कौन सी है?
ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) सबसे अच्छी है क्योंकि यह पानी की बचत के साथ पैदावार बढ़ाती है।
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