बाढ़ वाले खेतों के लिए बड़ी राहत! CR Dhan 501 से धान की पैदावार बढ़ाने की नई उम्मीद

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किसान भाइयों, धान की खेती में सबसे बड़ी परेशानियों में से एक है लगातार जल-जमाव और अचानक आने वाली बाढ़। कई इलाकों में बारिश के बाद खेतों में कई दिनों तक पानी खड़ा रहता है। ऐसी स्थिति में सामान्य धान की किस्मों की बढ़वार रुक जाती है, कल्ले कम निकलते हैं और कई बार पूरी फसल को नुकसान उठाना पड़ता है।

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CRRI Launches CR Dhan 501 For Waterlogged Rice: पानी में डूबे खेतों के लिए नई उम्मीद

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए कटक स्थित सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) ने जल-जमाव और मध्यम से कम गहरे पानी वाले क्षेत्रों के लिए नई धान किस्म CR Dhan 501 जारी की है। इस किस्म को ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयोगी माना जा रहा है, जहां फसल के दौरान लंबे समय तक पानी जमा रहने की समस्या बनी रहती है।

सबसे खास बात यह है कि CR Dhan 501 की अवधि करीब 155 दिन बताई गई है और इसकी औसत उपज क्षमता लगभग 4.0 टन प्रति हेक्टेयर है। इसे सेंट्रल वैरायटीज रिलीज कमेटी ने असम और उत्तर प्रदेश के लिए जारी किया है। कृषि से जुड़ी ऐसी ही नई जानकारी के लिए किसान भाइयों Bihar Agro को विजिट करें।

पानी से परेशान खेतों में क्यों जरूरी है CR Dhan 501?

भारत में धान की खेती का एक बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में होता है जहां बारिश के मौसम में खेतों में पानी जमा हो जाता है। खासकर तटीय और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आने से किसानों के सामने फसल बचाने की चुनौती खड़ी हो जाती है।

बताया गया है कि देश में करीब 30 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र जल-जमाव की समस्या से प्रभावित है। कई क्षेत्रों में फसल के बढ़वार काल के दौरान लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर तक पानी लंबे समय तक खड़ा रह सकता है।

ऐसे खेतों में केवल खाद, दवा या पानी निकासी के भरोसे अच्छी पैदावार लेना हमेशा आसान नहीं होता। इसलिए वैज्ञानिकों का जोर ऐसी किस्में विकसित करने पर है जो इन विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

CR Dhan 501 की ये खूबियां किसानों के लिए बन सकती हैं गेमचेंजर

CRRI के अनुसार, जल-जमाव वाले वातावरण में कामयाब धान की किस्म में कुछ विशेष गुण होना जरूरी है। CR Dhan 501 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

जल-जमाव वाले खेतों के लिए उपयुक्त पौधे में मजबूत तना, उचित ऊंचाई, सीधी पत्तियां और शुरुआती अवस्था में प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ऐसे पौधे जिनकी लंबाई पानी बढ़ने के साथ बहुत तेजी से नहीं बढ़ती, उनके गिरने की संभावना अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसके अलावा मजबूत बीज डोरमेंसी भी महत्वपूर्ण गुण है।

CR Dhan 501 की लगभग 4.0 टन प्रति हेक्टेयर उपज क्षमता किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जल-जमाव वाले क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाना सामान्य खेतों की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है।

CRRI की दूसरी किस्मों से भी किसानों को मिली है मदद

CRRI ने ओडिशा सहित विभिन्न क्षेत्रों में मध्यम और कम गहरे पानी वाले इलाकों के लिए कई धान की किस्मों की पहचान और विकास किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ऐसी करीब 11 किस्मों की उपज क्षमता 3.0 से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच बताई गई है।

इनमें वर्षाधान भी एक चर्चित किस्म है, जिसे 2005 में जारी किया गया था। इसकी उपज क्षमता करीब 4.0 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है।

इससे साफ है कि जल-जमाव वाले इलाकों के लिए धान की किस्मों पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम कर रहे हैं और CR Dhan 501 उसी प्रयास की नई कड़ी है।

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खेत में पानी भरने से धान को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

जल-जमाव केवल पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचने की समस्या नहीं है। खेत में लगातार पानी खड़ा रहने से मिट्टी की स्थिति भी बदलती है।

फसल की शुरुआती अवस्था में अधिक पानी रहने पर कल्ले निकलने की संख्या घट सकती है। कमजोर पौधों के मरने की संभावना भी बढ़ जाती है। पानी की निकासी सही नहीं होने पर मिट्टी में कुछ जहरीले तत्वों का प्रभाव बढ़ सकता है।

इन परिस्थितियों में आयरन टॉक्सिसिटी और सल्फाइड इंजरी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। साथ ही कमजोर पौधों पर कीट और रोग का दबाव भी बढ़ सकता है।

यही वजह है कि जल-जमाव वाले खेतों में सिर्फ अच्छी किस्म का चुनाव ही नहीं, बल्कि खेत की नियमित निगरानी और उचित प्रबंधन भी जरूरी है।

धान में SRBSDV वायरस की दस्तक ने बढ़ाई नई चिंता

एक तरफ किसान जल-जमाव से निपटने के लिए बेहतर किस्मों की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ धान में Southern Rice Black-Streaked Dwarf Virus यानी SRBSDV की पहचान ने वैज्ञानिकों और किसानों की चिंता बढ़ाई है।

पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में जांच किए गए धान के नमूनों में SRBSDV की पहचान की गई है। शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययन में पौधों की रुकी हुई बढ़वार और इस वायरस के बीच संभावित संबंध के संकेत मिले हैं।

हालांकि खेत में वायरस के प्रसार और उसके वाहक की भूमिका को पूरी तरह समझने के लिए आगे अध्ययन किया जा रहा है। विशेष रूप से White-backed Planthopper यानी WBPH को संभावित वाहक के रूप में जांचा जा रहा है।

किसान अभी से रखें WBPH पर नजर, छोटी गलती पड़ सकती है भारी

अगर धान की फसल की बढ़वार अचानक रुकने लगे या पौधों का विकास सामान्य दिखाई न दे, तो किसान भाइयों को खेत का निरीक्षण करना चाहिए।

WBPH की मौजूदगी जांचने का एक आसान तरीका यह है कि कुछ पौधों को थोड़ा झुकाकर उनके निचले हिस्से पर थपथपाया जाए। ऐसा करने पर अगर निम्फ या वयस्क कीट मौजूद हैं, तो वे पानी की सतह पर दिखाई दे सकते हैं।

खेत की मेड़ और आसपास के खरपतवार साफ रखना भी जरूरी है। शुरुआती अवस्था में संदिग्ध संक्रमित पौधों की पहचान करके उन्हें खेत से निकालना संक्रमण के दबाव को कम करने में मदद कर सकता है।

संक्रमण 5 से 20 प्रतिशत हो तो अपनाएं यह तरीका

यदि फसल में संक्रमण की दर करीब 5 से 20 प्रतिशत के बीच है, तो कृषि सलाह के अनुसार प्रभावित कल्लों को हटाकर उनकी जगह स्वस्थ कल्ले लगाए जा सकते हैं।

लेकिन किसान किसी भी दवा का इस्तेमाल केवल देखकर या अनुमान के आधार पर न करें। खेत में कीट की सही पहचान और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

WBPH मिलने की स्थिति में दी गई सलाह के अनुसार निम्न विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है:

  • Pexalon 10 SC (Triflumezopyrim): 235 मिलीलीटर/हेक्टेयर
  • Osheen/Token 20 SG (Dinotefuran): 200 ग्राम/हेक्टेयर
  • Chess 50 WG (Pymetrozine): 300 ग्राम/हेक्टेयर

छिड़काव करते समय पौधे के निचले हिस्से को लक्ष्य करना महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि WBPH अक्सर पौधे के निचले हिस्से में पाया जाता है।

बाढ़ और वायरस दोनों से बचाव के लिए किसान क्या करें?

धान की फसल में इस समय दो स्तरों पर सावधानी जरूरी है। एक तरफ खेत में पानी की स्थिति पर नजर रखनी होगी और दूसरी तरफ कीट एवं वायरस के लक्षणों की निगरानी करनी होगी।

किसानों को खेत की मेड़ों और आसपास के खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिए। नियमित अंतराल पर पौधों की बढ़वार, रंग और कल्लों की स्थिति देखनी चाहिए।

अगर किसी हिस्से में पौधे बाकी फसल की तुलना में कमजोर या बौने दिखाई दें, तो उस हिस्से की अलग से जांच करें। साथ ही WBPH की मौजूदगी के लिए नियमित सर्वे करें।

CR Dhan 501 से पूर्वी भारत के किसानों को कितनी उम्मीद?

पूर्वी भारत में धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है और कई क्षेत्रों में बारिश, बाढ़ तथा जल-जमाव सामान्य कृषि चुनौती हैं। ऐसे में ऐसी किस्मों की जरूरत लगातार महसूस की जाती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्पादन क्षमता बनाए रख सकें।

CR Dhan 501 का असम और उत्तर प्रदेश के लिए जारी होना इसी जरूरत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। करीब 155 दिन की अवधि और 4.0 टन प्रति हेक्टेयर की बताई गई औसत उपज क्षमता इसे जल-जमाव वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए ध्यान देने योग्य विकल्प बनाती है।

हालांकि किसी भी नई किस्म को बड़े क्षेत्र में अपनाने से पहले किसानों को अपने स्थानीय कृषि-जलवायु, मिट्टी, पानी की गहराई और अनुशंसित क्षेत्र के अनुसार कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए।

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नई किस्म के साथ खेत की निगरानी भी उतनी ही जरूरी

किसान भाइयों, सिर्फ नई किस्म लगाने से हर समस्या खत्म नहीं होती। जल-जमाव वाले खेत में सही किस्म के साथ समय पर निगरानी, खरपतवार नियंत्रण, कीट पहचान और रोग प्रबंधन भी जरूरी है।

CR Dhan 501 जल-जमाव वाले क्षेत्रों में धान उत्पादन की चुनौती को कम करने की दिशा में एक नई उम्मीद जरूर पैदा करती है। वहीं SRBSDV और WBPH की निगरानी यह याद दिलाती है कि आधुनिक धान उत्पादन में किस्म चयन और वैज्ञानिक कीट प्रबंधन दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

FAQ: CR Dhan 501 और SRBSDV से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

CR Dhan 501 क्या है?

CR Dhan 501 CRRI, कटक द्वारा विकसित धान की नई किस्म है, जिसे मध्यम या कम गहरे पानी वाले जल-जमाव प्रभावित क्षेत्रों के लिए जारी किया गया है।

CR Dhan 501 की अवधि कितनी है?

इस किस्म की फसल अवधि करीब 155 दिन बताई गई है।

CR Dhan 501 की उपज क्षमता कितनी है?

इसकी औसत उपज क्षमता करीब 4.0 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है।

CR Dhan 501 किन राज्यों के लिए जारी की गई है?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसे असम और उत्तर प्रदेश के लिए सेंट्रल वैरायटीज रिलीज कमेटी द्वारा जारी किया गया है।

जल-जमाव से धान की फसल को क्या नुकसान होता है?

लंबे समय तक पानी जमा रहने से कल्ले कम निकल सकते हैं, पौधों के मरने का खतरा बढ़ सकता है और आयरन टॉक्सिसिटी तथा सल्फाइड इंजरी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

SRBSDV क्या है?

SRBSDV का पूरा नाम Southern Rice Black-Streaked Dwarf Virus है। यह धान के पौधों में बौनेपन और रुकी हुई बढ़वार से संबंधित वायरस है।

SRBSDV का संभावित वाहक कौन है?

वैज्ञानिक अध्ययन में White-backed Planthopper (WBPH) की संभावित वाहक भूमिका की जांच की जा रही है।

WBPH की पहचान खेत में कैसे करें?

धान के कुछ पौधों को झुकाकर निचले हिस्से पर थपथपाने से WBPH के निम्फ या वयस्क पानी की सतह पर दिखाई दे सकते हैं।

WBPH मिलने पर किसान क्या करें?

सबसे पहले कीट की सही पहचान करें और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें। उपलब्ध कृषि सलाह में Pexalon, Dinotefuran और Pymetrozine आधारित विकल्प दिए गए हैं।

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